पटना : 40% प्री-मैच्योर शिशुओं में अंधेपन की बीमारी संभव
Updated at : 25 Mar 2019 10:07 AM (IST)
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आइएपी बिहार के सीएमइ में देश भर से आये विशेषज्ञों ने रखे विचार पटना : देश भर में सालाना पैदा होने वाले करीब 2.7 करोड़ नवजात शिशुओं में लगभग 35 लाख प्री-मैच्योर (समय से पूर्व जन्म लेने वाले) होते हैं. इन प्री-मैच्योर शिशुओं में से करीब 40 फीसदी में अंधेपन की गंभीर बीमारी रेटिनोपैथी ऑफ […]
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आइएपी बिहार के सीएमइ में देश भर से आये विशेषज्ञों ने रखे विचार
पटना : देश भर में सालाना पैदा होने वाले करीब 2.7 करोड़ नवजात शिशुओं में लगभग 35 लाख प्री-मैच्योर (समय से पूर्व जन्म लेने वाले) होते हैं. इन प्री-मैच्योर शिशुओं में से करीब 40 फीसदी में अंधेपन की गंभीर बीमारी रेटिनोपैथी ऑफ प्री-मैच्योरिटी (आरओपी) के लक्षण पाये जाते हैं.
समय पर इसका पता नहीं लगने पर शिशु धीरे-धीरे नेत्रहीन हो जाते हैं. बचाव के लिए जरूरी है कि अभिभावक ऐसे शिशुओं की 30 दिन के अंदर आरओपी स्क्रीनिंग अवश्य कराएं. इससे उनके अंधेपन को रोका जा सकता है. उक्त बातें रविवार को इंडियन एकेडमी ऑफ पेडियेट्रिक्स की बिहार शाखा द्वारा आयोजित सीएमइ में विशेषज्ञ डॉक्टरों ने कही.
नवजात का एसपीओ टू 90 से 95 प्रतिशत रखें
आरपी सेंटर एम्स नयी दिल्ली के डॉ पारिजात चंद्रा ने डॉक्टरों से कहा कि प्री-मैच्योर शिशुओं में उन्हीं बच्चों को ऑक्सीजन दिया जाये, जिनका एसपीओ टू 90 प्रतिशत से कम हो. चिकित्सकों को ध्यान देना चाहिए कि नवजात बच्चों को एसपीओ टू 90 से 95 प्रतिशत के बीच रखा जाये. इससे अधिक एसपीओ टू होने पर आरओपी का खतरा समय से पहले जन्मे कमजोर बच्चों को बढ़ जाता है. सीएमइ में वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ प्रो बीके सिंह, प्रो उत्पलकांत सिंह, प्रो एसए कृष्णा, प्रो एके जायसवाल, नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ सत्यप्रकाश तिवारी, डॉ रणधीर झा, डॉ सुनील सिंह, डॉ सुभाष प्रसाद, डॉ शेखर चौधरी, डॉ अभिषेक आनंद आदि भी शामिल हुए.
दो किलो वजन से कम बच्चे का रखें ध्यान
बेंगलुरु से आये पेडिएट्रिक रेटिनल सर्जन व आरओपी विशेषज्ञ डॉ आनंद विनेकर ने बताया कि 35 सप्ताह से पहले जन्म लेने व दो किलो से कम वजन वाले बच्चों पर ध्यान देने की जरूरत है. आरओपी आंखों से जुड़ी नस की बीमारी है. अभिभावक इसको लेकर सजग रहें. हर साल इलाज न होने की वजह से डेढ़ से दो लाख बच्चे अंधेपन का शिकार हो रहे हैं. आरओपी स्क्रीनिंग में कैमरे के माध्यम से इसकी जांच होती है. भारत में विकसित यह कैमरा देश भर के करीब दो हजार विशेषज्ञों के लिए वरदान है.
आइजीआइएमएस में लेजर इलाज संभव
इंडियन एकेडमी ऑफ पेडियेट्रिक्टस की बिहार शाखा के अध्यक्ष व एनएमसीएच के शिशु रोग विभागाध्याक्ष डॉ विनोद कुमार सिंह ने बताया कि रेटिना से जुड़ी इस बीमारी का बिहार में सिर्फ आइजीआइएमएस में लेजर के जरिये इलाज संभव है. पीएमसीएच व एनएमसीएच में आरओपी स्क्रीनिंग कर बीमारी का पता लगाया जा सकता है. राजधानी के प्राइवेट अस्पतालों में भी महज 30 हजार रुपये के खर्च पर इसके इलाज की सुविधा उपलब्ध है.
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