पटना : मोटर गैरेज व सर्विस स्टेशनों से निकलने वाले गंदे पानी को करना होगा साफ
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :17 Mar 2019 8:55 AM (IST)
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पटना : मोटर गैरेज व सर्विस स्टेशन प्रदूषण मानक के ऑरेंज श्रेणी में आते हैं. इनसे धुलाई के पश्चात निकले गंदे पानी में खतरनाक श्रेणी के तेल व ग्रीस होते हैं. ऐसे सर्विस स्टेशनों/गैरेजों से उत्सर्जित गंदे पानी को मानक के अधीन कर जल स्रोतों में प्रवाहित करना होगा. इनके ट्रीटमेंट के लिए एफ्लुएंट ट्रीटमेंट […]
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पटना : मोटर गैरेज व सर्विस स्टेशन प्रदूषण मानक के ऑरेंज श्रेणी में आते हैं. इनसे धुलाई के पश्चात निकले गंदे पानी में खतरनाक श्रेणी के तेल व ग्रीस होते हैं. ऐसे सर्विस स्टेशनों/गैरेजों से उत्सर्जित गंदे पानी को मानक के अधीन कर जल स्रोतों में प्रवाहित करना होगा. इनके ट्रीटमेंट के लिए एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (इटीपी) का इंतजाम किया जा सकता है.
शनिवार को बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद द्वारा आयोजित कार्यशाला में उक्त बातें वैज्ञानिकों ने कहीं. मोटर गैरेज संचालकों को उनकी इकाई से उत्पन्न जल एवं वायु प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण हेतु प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से आयोजित इस जागरूकता कार्यशाला का उद्घाटन पर्षद के अध्यक्ष अशोक कुमार घोष ने किया.
उन्होंने कहा कि ऐसी इकाइयों की स्थापना एवं गतिविधि संचालन हेतु राज्य पर्षद से सहमति अनिवार्य है. इनके नियमन के लिए मार्च, 2016 में नियम भी अधिसूचित है.
वाहनों में वृद्धि के साथ बढ़े सर्विस स्टेशन
डाॅ घोष ने बताया कि मोटर वाहनों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि के साथ-साथ मोटर गैरेजों व सर्विस स्टेशनों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है.
इनसे गाड़ियों की धुलाई में निकले तेल, ग्रीस व प्रदूषक पदार्थ नालियों के माध्यम से जल स्रोतों एवं भूगर्भीय जल को प्रदूषित करते हैं. उन्होंने प्रतिभागियों से अपील की कि कानून के अनुपालन के साथ-साथ प्रदूषण नियंत्रण के सामाजिक दायित्वों का भी अनुपालन करें, ताकि आने वाली पीढ़ी को प्रदूषण मुक्त पर्यावरण मिल सके.
पर्षद के विश्लेषक एसएन जायसवाल ने पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन के माध्यम से सर्विस स्टेशनों एवं मोटर गैरेजों के प्रदूषण नियंत्रण के वैधानिक दायित्वों पर विस्तार से प्रकाश डाला. पर्षद के वैज्ञानिक डॉ नवीन कुमार ने कहा कि वैसे सर्विस स्टेशन-गैरेज जहां गाड़ियों की धुलाई नहीं होती है, वे व्हाइट श्रेणी में आते हैं. इन्हें राज्य पर्षद से सहमति की जरूरत नहीं होती, लेकिन पर्यावरणीय कानूनों का पालन करना होता है.
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