अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस : बिहार में महिला सशक्तीकरण की अगदूत थीं रूकैया सखावत हुसैन, खोला था लड़कियों का पहला स्कूल
Updated at : 08 Mar 2019 7:21 AM (IST)
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साकिब पटना : रूकैया सखावत हुसैन, यह वह नाम है, जिसने बिहार में पहली बार लड़कियों को शिक्षित करने के लिए न सिर्फ आवाज उठायी, बल्कि कुछ कर भी दिखाया. उन्होंने भागलपुर में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला. यह तब की बात है, जब लड़कियों को शिक्षित करना किसी अजूबे से कम नहीं था. […]
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साकिब
पटना : रूकैया सखावत हुसैन, यह वह नाम है, जिसने बिहार में पहली बार लड़कियों को शिक्षित करने के लिए न सिर्फ आवाज उठायी, बल्कि कुछ कर भी दिखाया. उन्होंने भागलपुर में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला.
यह तब की बात है, जब लड़कियों को शिक्षित करना किसी अजूबे से कम नहीं था. समाज के लिए यह अकल्पनीय काम था. यही कारण है कि इस स्कूल का खूब विरोध भी हुआ. रूकैया का जन्म वर्तमान बांग्लादेश के रंगपुर में हुआ था. परिवार जमींदार और शिक्षित था.
इसका असर इन पर हुआ. रूकैया ने बांग्ला, उर्दू और अंग्रेजी की शिक्षा हासिल की और लेखन करने लगीं. महिलाओं के अधिकार और उनकी समस्याओं पर खूब लिखा. उनकी शादी 1896 में अंग्रेजी सरकार में बड़े अधिकारी और भागलपुर के रहने वाले सखावत हुसैन से हुई.
सखावत खुद उच्च शिक्षित थे. वह रूकैया के सपनों को साकार करने के लिए हर संभव मदद करने लगे. उनकी अंग्रेजी में लिखी रचना ‘सुल्ताना का सपना’ 1905 में आयी. यही वह रचना थी, जिसके कारण उनकी पहचान जिंदा रही. 1909 तक भागलपुर में रहने के बाद वह कोलकाता चली गयीं. इस वक्त उनके पति का देहांत हो चुका था. इसके बाद कीपूरी जिंदगी रूकैया ने साहित्य से दूरी बना ली और लड़कियों को शिक्षित करना अपनी जिंदगी का लक्ष्य बना लिया. कोलकाता में उनका खोला हुआ स्कूल आज भी मौजूद है.
कोलकाता जाने के बाद भी बिहार से उनका लगाव बना रहा. इसे साबित करती है उनकी चर्चित रचना ‘अबरोध बासिनी’, जिसमें उन्होंने आरा, किऊल जैसी जगहों का कई बार जिक्र किया है. उन पर शोध कर रहे वरिष्ठ पत्रकार नसिरूद्दीन कहते हैं कि रूकैया ने बिहार में लड़कियों का पहला स्कूल खोला था. उनके पति ने अपनी मृत्यु से पहले लड़कियों के स्कूल के लिए 10 हजार रुपये अलग से रखे हुए थे.
यह रकम उस जमाने में बड़ी रकम थी. बिहार के लिए उन्होंने बहुत कुछ किया, लेकिन दुख की बात है कि बिहार ने उन्हें वह सम्मान नहीं दिया, जिसकी वह हकदार हैं. वह कहते हैं कि बंटवारे के कारण शायद उनका इतिहास कहीं खो सा गया. अगर वह अंग्रेजी में अपनी रचना नहीं करतीं तो शायद आज हम उन्हें जितना जानते हैं, उतना भी नहीं जानते.
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