दवा ही रिएक्शन करके बन रही मर्ज, मरीज बेबस, आईजीआईएमएस में एक मरीज की दवा रिएक्शन से हो चुकी है मौत

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 29 Sep 2018 3:30 AM

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पटना : मर्ज दूर करने के लिए मरीज दवा का उपयोग करते हैं, पर जब दवा ही मर्ज बनने लगे तो मरीज बेबस हो जाते हैं और व्यवस्था लाचार बन जाती है. किसी मरीज की ड्रग रिएक्शन से मौत भी हुई तो दवा कंपनियों की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता. इस साल ही आईजीआईएमएस […]

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पटना : मर्ज दूर करने के लिए मरीज दवा का उपयोग करते हैं, पर जब दवा ही मर्ज बनने लगे तो मरीज बेबस हो जाते हैं और व्यवस्था लाचार बन जाती है. किसी मरीज की ड्रग रिएक्शन से मौत भी हुई तो दवा कंपनियों की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता. इस साल ही आईजीआईएमएस में एक मरीज की दवा रिएक्शन से मौत हो चुकी है.
जनता को इसकी जानकारी मिल जाये तो इस तरह की दवा को बाजार में झोंककर मुनाफा कमानेवाली कंपनियों पर नकेल भी कसेगी. पर सच तो यह है कि इसकी जानकारी चिकित्सकों को भी नहीं है. मरीजों के लिए अबूझ पहेली है दवाओं का रिएक्शन बहुत सी दवाओं के रिएक्शन होते हैं.
कुछ चिकित्सक इसकी जानकारी अपने मरीज को दे देते हैं. पर रिएक्शन होने पर उसकी रिपोर्टिंग नहीं करते. अधिसंख्य मरीजों को दवा खाने के बाद यह पता नहीं चलता कि उसे उल्टी क्यों हो रही है, पेट में मरोड़ के साथ गंभीर रूप से दस्त क्यों हो रहा है. अचानक दवा खाने के बाद सांसों की गति क्यों तेज हो गयी, होठ-चेहरे और जीभ में सूजन कैसे हुआ.
दवा खाने के बाद चक्कर व बेहोशी की स्थिति कैसे आयी. शरीर के त्वचा पर चकता क्यों हुआ. महिलाओं को यह जानकारी नहीं होती कि उनके यौनमार्ग में खुजली और अधिक स्राव का कारण दवाओं का रिएक्शन है. कुछ मरीजों के जीभ में सफेद पैच कहां से निकल आये. ये सामान्य प्रकार की समस्या है जो दवा खाने के बाद रिएक्शन के रूप में मरीजोंमें देखी जाती है. कभी-कभी तो दवा खाने के बाद मरीजों की मौत तक हो जाती है.
जेएनएम मेडिकल कॉलेज, रायपुर (छत्तीसगढ़ ) की केस स्टडी
बिहार के किसी भी मेडिकल कालेज अस्पताल में इस तरह की केस स्टडी नहीं की गयी है. इधर रायपुर के मेडिकल कॉलेज के एडीआर मॉनिटरिंग सेंटर द्वारा 26 मार्च 2018 को वेब पब्लिकेशन किया गया है. यहां के डा प्रीति सिंह, मंजू अग्रवाल, राजेश हिसिकर, उषा जोशी, बसंत माहेश्वरी और अजय हलवाई द्वारा की गयी सर्वे रिपोर्ट को प्रकाशित किया गया है.
सितंबर 2015-अगस्त 2016 के बीच एडीआर सेंटर पर कुल 232 मरीजों ने दवाओं के कुप्रभाव की रिपोर्ट की. इस दौरान अस्पताल में ओपीडी और भर्ती मरीजों की संख्या 532514 दर्ज की गयी थी. शोधार्थियों द्वारा जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि दिसंबर2015 और जनवरी 2016 में सर्वाधिक गंभीर रिएक्शन के मामले पाये गये. यह देखा गया कि दवाओं के कुप्रभाव का सर्वाधिक 45 फीसदी मामला एंटीबायोटिक,एंटी फंगल, एंटी वायरल और एंटी बैक्टेरियल दवाओं के समूह में पाया गया.
जिन मरीजों में सर्वाधिक 52.15 प्रतिशत दवाओं के कुप्रभाव हुए उनकी उम्र 31-60 वर्ष के बीच थी. यह वहीं कामकाजी आयु वर्ग है जिसे स्वास्थ्य को लेकर अधिक चिंता होती है. अगर लिंग भेद को देखा जाये तो 32.33 प्रतिशत रिएक्शन के मामले पुरुषों में जबकि 67.67 प्रतिशत मामले महिलाओं में पाये गये. यह भी पाया गया कि दवाओं के कुप्रभाव का 22 फीसदी मामला स्त्री एवं प्रसूति विभाग के मिले थे.
विश्लेषण में यह भी पाया गया कि चिकित्सकों द्वारा एक ही पुर्जे पर चार से अधिक दवाओं की सूची(पॉली फार्मेसी) वाले मरीजों में 66 फीसदी में दवा रिएक्शन के मामले पाये गये हैं. 21.55 फीसदी मामलों की रिपोर्टिंग ओपीडी के माध्यम से जबकि 78.45 फीसदी मामलों की रिपोर्टिंग भर्ती मरीजों द्वारा की गयी थी.
क्या है एडवर्स ड्रग रिएक्शन का रिपोर्टिंग सिस्टम
पूरे भारत में एडवर्स ड्रग रिएक्शन(एडीआर) के लिए एडवर्स ड्रग रिएक्शन मॉनिटरिंग सेंटर की स्थापना की गयी है. मरीजों को किसी भी प्रकार की दवा से होनेवाले रिएक्शन को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर हेल्पलाइन 18001803024 जारी की गयी है. इस हेल्पलाइन की जानकारी तो चिकित्सकों को भी नहीं है. बिहार में एडीआर सेंटर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान,पटना(एम्स) और इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (आईजीआईएमएस) कर रहे हैं.
दोनों संस्थाओं में दवाओं के कुप्रभाव की रिपोर्टिंग की पारदर्शी व्यवस्था नहीं है. इन सेंटरों का नाम भी कहीं दिखता. एम्स में दवाओं के कुप्रभाव की रिपोर्ट पीएसएम और फार्माकोलॉजी विभाग द्वारा की जाती है. एम्स के पास अपने ही मरीजों का फीडबैक मिलता है. यहां के डीन व फार्माकोलॉजी विभाग के हेड डा पीपी गुप्ता ने बताया कि हर महीने औसतन 20-25 मरीजों में इस तरह के रिएक्शन की सूचना मिलती है. यह सामान्य किस्म के रिएक्शन होते हैं.
इसकी मॉनिटरिंग की जाती है. इसी तरह से एम्स के पीएसएम विभागाध्यक्ष डा नीरज अग्रवाल ने बताया कि वैक्सिन में सामान्य किस्म के मामलों की सूचना नहीं मिलती. ऐसे में किसी की मौत हो जाये तो यह गंभीर मुद्दा बन जाता है. उन्होंने बताया कि मिजिल्स के टीके के बाद सामान्य बुखार होता है. इसी तरह से मिजिल्स टीका देने के मामले में 10 लाख में एक बच्चे में बेहोशी की शिकायत आ सकती है.
राज्य में अभी 15 प्रकार के वैक्सिन का प्रयोग होता है. हालांकि वैक्सिन से ही लाखों बच्चों को गंभीर प्रकार की बीमारियों से छुटकारा पाया गया है.
आईजीआईएमएस में प्रति माह 40 मरीजों में दवा का रिएक्शन
आईजीआईएमएस के फार्माकोलॉजी विभागाध्यक्ष सह सेंटर इंचार्ज, आईएमए बिहार के महासचिव व नेशनल सिग्नल रिव्यू कमेटी पैनल के सदस्य डा हरिहर दीक्षित ने बताया कि उनके संस्थान में औसतन 40 मरीजों में ड्रग रिएक्शन की सूचना मिलती है. इस वर्ष एक मरीज की दवा रिएक्शन से मौत भी हुई है. उन्होंने बताया कि विदेशों में बननेवाली दवाओं का भारत व बिहार में क्या असर हुआ यह तो मरीजों पर होनेवाले असर के बाद ही पता चलेगा.
उन्होंने बताया कि 2012 में प्रतिबंधित की गयी दवा के सेवन से मरीजों में मधुमेह कीशिकायत बढ़ने लगी थी. इसी तरह से इंट्रोक्यूनल दवा से जापान के लोगों में नेत्र रोग की समस्या बढ़ गयी थी जबकि भारत में इसका कोई कुप्रभाव नहीं मिला. उन्होंने बताया कि दवाओं की सुरक्षा पहली प्राथमिकता होनी चाहिए.
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