पटना : पीड़ित पर दबाव बनाने को काउंटर प्राथमिकी का दुरुपयोग
Updated at : 03 Aug 2018 9:02 AM (IST)
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40 फीसदी केसों में दर्ज करायी जाती है काउंटर प्राथमिकी, डीआईजी के आदेश के बाद मिलेगी राहत पटना : पीड़ित पर दबाव बनाने के लिए काउंटर प्राथमिकी को कानूनी तरकीब के रूप में उपयोग किया जाता है. किसी को भी काउंटर प्राथमिकी दर्ज कराने का अधिकार प्राप्त है. लेकिन इस कानूनी अधिकार का दुरुपयोग ही […]
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40 फीसदी केसों में दर्ज करायी जाती है काउंटर प्राथमिकी, डीआईजी के आदेश के बाद मिलेगी राहत
पटना : पीड़ित पर दबाव बनाने के लिए काउंटर प्राथमिकी को कानूनी तरकीब के रूप में उपयोग किया जाता है. किसी को भी काउंटर प्राथमिकी दर्ज कराने का अधिकार प्राप्त है. लेकिन इस कानूनी अधिकार का दुरुपयोग ही किया जाता है. एक अनुमान के तहत मारपीट, छेड़खानी, रंगदारी, जालसाजी के 40 फीसदी मामलों में काउंटर प्राथमिकी दर्ज करायी जाती है.
इन मामलों को दर्ज करने में पुलिस की भूमिका भी संदिग्ध होती है. क्योंकि सही बात जानते हुए भी काउंटर प्राथमिकी दर्ज कर ली जाती है. इसके बाद दोनों पक्षों के मामले को जांच में डाल देते हैं. इसके साथ ही काउंटर प्राथमिकी दर्ज होते ही पीड़ित भी अपने आप दबाव में आ जाता है. इसके बाद समझौता का दौर चलता है और पीड़ित अंत में सुलहनामे पर दस्तखत कर देता है. क्योंकि काउंटर प्राथमिकी दर्ज होने पर उसे भी यह जानकारी हो जाती है कि उसे भी अब कानूनी प्रक्रिया अपनानी पड़ेगी. इससे कई बार पीड़ित को झुकना पड़ जाता है. घर, मुहल्ला या सड़क पर मारपीट के अधिकतर मामलों में काउंटर प्राथमिकी दर्ज होती है.
हत्या के प्रयास, छेड़खानी, रंगदारी के मामलों में भी काउंटर प्राथमिकी का प्रचलन बढ़ा है. इसी तरह के मामले लगातार आने के कारण ही डीआईजी सेंट्रल राजेश कुमार ने यह आदेश जारी किया कि 10 घंटे बाद काउंटर प्राथमिकी दर्ज न करें. बल्कि जांच कर दोषी को गिरफ्तार करें.
किसी को जानकारी मिल जाये कि उसके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हो चुकी है या फिर होने वाली है, तो वह खुद को बचाने के लिए काउंटर प्राथमिकी का सहारा लेता है. ताकि वह कानूनी रूप से मजबूत रहे और न्यायालय को यह बता सके कि उसने भी पुलिस को जानकारी दी थी.
अगर किसी ने किसी का सिर फोड़ दिया और पीड़ित थाने में प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए जाता है. जैसे ही आरोपित को पता चलता है कि उसके खिलाफ मामला दर्ज हो गया है, तो वह अपने आप को बचाने के लिए नयी कहानी लेकर थाना पहुंच जाता है. इसके बाद गलत आरोप लगा कर प्राथमिकी दर्ज करा देता है.
यहां तक कि जालसाजी के मामलों में भी कुछ ऐसा ही होता है.ऐसी गड़बड़ी के मामले : पीएचईडी के तत्कालीन कार्यपालक पदाधिकारी विनय कुमार सिन्हा को भी यह भनक लग गयी थी कि शौचालय घोटाले में उसके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हो सकती है. इसके बाद उसने अपने बचने के लिए एकाउंटेंट बिटेश्वर प्रसाद पर ही गांधी मैदान थाने में प्राथमिकी दर्ज करा दी. इसमें गांधी मैदान थानाध्यक्ष प्रियरंजन की भी संलिप्तता आयी.
सूचना गलत होने पर की जा सकती है कार्रवाई
आमतौर पर मारपीट, छेड़खानी, हत्या के प्रयास, जालसाजी, रंगदारी आदि के मामलों में 40 फीसदी काउंटर प्राथमिकी दर्ज की जाती है. इससे पीड़ित पर दबाव बनाया जाता है. पहली प्राथमिकी दर्ज होते ही उसमें समय पर जांच कर ली जाये, तो आरोपित की गिरफ्तारी हो सकती है. अगर पहली प्राथमिकी ही गलत हुई हो, तो जांच में उसकी सूचना गलत होने पर उस पर भी कार्रवाई की जा सकती है.
राजेश कुमार, डीआईजी सेंट्रल
पटना : थाने का खेल अब समाप्त. अनुसंधान, सुपरविजन, मेडिकल रिपोर्ट, एफएसएल रिपोर्ट के चक्कर में अब फरियादी थाने के चक्कर नहीं लगायेंगे.
पटना रेंज के डीआईजी राजेश कुमार ने एक बार फिर से पांच बिंदुओं पर नया निर्देश जारी किया है. नये निर्देश के तहत पटना और नालंदा जिले में तैनात सभी एसडीपीओ, सर्किल इंस्पेक्टर और थानेदार को थाने में दर्ज किये जाने वाले हर केस का सुपरविजन 10 दिनों के अंदर हर हाल में करना है. ऐसा नहीं करने पर यह माना जायेगा कि केस की जांच कर रिपोर्ट बनाने में एसडीपीओ और सर्किल इंस्पेक्टर लापरवाही बरत रहे हैं.
अब हर केस की समीक्षा और उसमें किये गये कार्य की डेवलपमेंट रिपोर्ट एसडीपीओ और इंस्पेक्टर को केस दर्ज होने के 25 दिनों के अंदर देनी होगी. बहुत सारे केस में पुलिस को मेडिकल रिपोर्ट की जरूरत होती है. ऐसे केस में मेडिकल कराने के 10 दिनों के अंदर ही उसकी रिपोर्ट प्राप्त करने को कहा गया है. इसके साथ ही एफएसएल की जांच के बाद 30 दिनों के अंदर उसकी रिपोर्ट भी प्राप्त करने का आदेश डीआईजी ने दिया है.
डीआईजी ने निर्देश में कहा है कि कोर्ट का ऑर्डर मिलने के तीन दिनों के अंदर फरार अभियुक्तों की संपत्ति को कुर्क किया जाये. थाने में दर्ज किये जाने वाले केस की चार्जशीट 60 दिनों में दाखिल किये जाने को कह दिया गया है.
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