मुजफ्फरपुर अल्पावास गृह कांड : फिर कसौटी पर होगी सीबीआई की साख

Updated at : 27 Jul 2018 6:47 AM (IST)
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मुजफ्फरपुर अल्पावास गृह कांड : फिर कसौटी पर होगी सीबीआई की साख

सुरेंद्र किशोर राजनीतिक विश्लेषक अब यह तय है कि सीबीआई मुजफ्फरपुर अल्पावास गृह कांड की जांच की जिम्मेदारी विधिवत उठा लेगी. पर इस मामले में एक बार फिर सीबीआई की साख कसौटी पर होगी. बिहार के दो अन्य महत्वपूर्ण मामलों की जांच भी सीबीआई कर रही है. लंबी जांच के बावजूद मुजफ्फरपुर के ही नवरूणा […]

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सुरेंद्र किशोर
राजनीतिक विश्लेषक
अब यह तय है कि सीबीआई मुजफ्फरपुर अल्पावास गृह कांड की जांच की जिम्मेदारी विधिवत उठा लेगी. पर इस मामले में एक बार फिर सीबीआई की साख कसौटी पर होगी. बिहार के दो अन्य महत्वपूर्ण मामलों की जांच भी सीबीआई कर रही है. लंबी जांच के बावजूद मुजफ्फरपुर के ही नवरूणा कांड में सीबीआई को कोई सफलता नहीं मिल सकी है.
उधर, भागलपुर के चर्चित सृजन घोटाले में भी तीन मुख्य आरोपित पकड़े नहीं जा सके. सीबीआई से यह उम्मीद की जाती रही है कि वह दोषी लोगों को जरूर पकड़ कर अदालत के कठघरे में हाजिर करवा देगी. चारा घोटाले में उसने हाजिर करवाया और सजा भी दिलवायी. पर उसमें जांच की निगरानी हाईकोर्ट कर रहा था.
अल्पावास कांड में देखना है कि अंततः क्या होता है! : इस कांड में भी प्रभावशाली लोगों के नाम आ रहे हैं. उनमें से कुछ ने कहा है कि उन्हें नाहक फंसाया जा रहा है. यदि अंततः सीबीआई निर्दोष को छोड़कर असली अपराधियों को अदालत के कठघरे में खड़ा करा दे तो उसकी साख बढ़ जायेगी. पर ताजा मामले में भी कुछ लोगों को इस बात पर संदेह है कि सीबीआई को सही नतीजे तक पहुंचने दिया जायेगा.
याद रहे कि हाल ही में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि यदि बिहार सरकार सिफारिश करेगी तो सीबीआई से जांच करा दी जायेगी. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जब सीबीआई जांच की सिफारिश का निर्णय कर दिया तो राजनाथ सिंह अपना वादा पूरा करेंगे ही. याद रहे कि कई बार सीबीआई काम के बोझ तथा अन्य कारणों से सिफारिश के बावजूद जांच करने से मना कर देती है.
बंद हो ऐसे मामले में पैरवी : बेचारे नेता लोग भी क्या करें? पैरवी के लिए उन पर तरह-तरह के दबाव रहते हैं. कुछ नेता दबाव के सामने नहीं झुकते. पर अधिकतर झुक जाते हैं. अल्पावास कांड में भी पैरवी की खबर है. ऐसी पैरवियों के कारण कई बार जांच एजेंसी प्रभाव में आ भी जाती है.
जो नेता न चाहते हुए भी ऐसी पैरवी करने को मजबूर हो जाते हैं, उनके बचाव के लिए एक संस्थागत उपाय किया जा सकता है. शासन ऐसी व्यवस्था कर सकता है कि हत्या व बलात्कार के आरोपितों के पक्ष में पैरवी करने वाले नेताओं के नाम उजागर कर दिये जाएं. लोग बाग नेता जी के असली रूप को जान तो लें. संभव है कि बदनामी के भय से कई नेता ऐसी पैरवी करने से पहले ही मना कर दें. इससे जांच एजेंसियों को अपना काम ठीक ढंग से करने में सुविधा हो जायेगी.
सीबीआई के प्रति अब उत्साह नहीं : कई दशक पहले तत्कालीन प्रतिपक्षी नेता कर्पूरी ठाकुर गंभीर कांंडों की जांच की मांग केबी सक्सेना और डीएन गौतम से कराने की सरकार से किया करते थे. तब केबी सक्सेना आईएएस अफसर और डीएन गौतम आईपीएस अफसर थे.
अब वे रिटायर्ड हो चुके हैं. वे कर्तव्यनिष्ठ और ईमानदार अफसर थे. वे किसी के दबाव में आकर कोई काम नहीं करते थे. पर वैसी मांग अब नहीं होती. बाद के वर्षों में सीबीआई से जांच कराने की मांग होने लगी. अब भी होती है. पर कम. या आधे मन से. कई नेताओं ने मुजफ्फरपुर बालिका गृह बलात्कार कांड मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग की. पर इस मांग के प्रति अन्य अनेक लोगों को कोई उत्साह नहीं था. सवाल पूछा गया कि भागलपुर सृजन घोटाले के तीन प्रमुख आरोपितों को गिरफ्तार करने में सीबीआई विफल क्यों रही? क्या सचमुच चाहते हुए भी सीबीआई उन्हें गिरफ्तार नहीं कर पा रही है? या फिर कोई और बात है? इस सवाल को लेकर तरह -तरह की चर्चाएं भी हैं.
चर्चाएं सीबीआई की साख बढ़ाने वाली नहीं हैं. बात थोड़ी पुरानी है. पर चूंकि बिहार से संबंधित है, इसलिए अनेक लोगों को याद है. बाॅबी हत्याकांड और ललित नारायण मिश्र हत्याकांड में भी सीबीआई की भूमिका विवादास्पद ही रही.
स्विस बैंकों में भारतीय धन
ताजा खबर यह है कि स्विस बैंक में 2016 के मुकाबले 2017 में भारतीयों की राशि में करीब साढ़े 34 प्रतिशत की कमी आयी है. यह खबर सही हो सकती है. पर सवाल है कि लिंचेस्टाइन के एलजीटी बैंक तथा अन्य टैक्स हेवेन देशों के बैंकों में भी ऐसी ही कमी आयी है?
क्या भारत सरकार ने कम से कम एलजीटी बैंक में भारतीयों की जमा राशि की पड़ताल कर ली है? दरअसल, मनमोहन सिंह के शासनकाल में राम जेठमलानी ने स्विस बैंक में भारतीयों के काले धन के खिलाफ जोरदार अभियान चलाया था. उन्हीं दिनों यह भी खबर आयी थी कि उस अभियान से घबरा कर अनेक भारतीयों ने अपने पैसे एलजीटी में जमा कर दिये. इधर, स्विस बैंक में भारतीयों के पैसे कम होने लगे. एलजीटी बैंक में 18 भारतीयों की जमा राशि का विवरण 9 जून 2011 के दिल्ली के एक अखबार में छपा था. उसका बाद में क्या हुआ, यह पता नहीं चला. उससे पहले एलजीटी बैंक के एक विद्रोही कर्मचारी ने बैंक के सारे खातेदारों के नामों की सूची वाली सीडी जर्मनी सरकार को बेच दी थी.
जर्मनी सरकार ने भारत सरकार से तब कहा था कि इसमें आपके देश के लोगों के भी नाम हैं. यदि आप चाहें तो ले सकते हैं. पर तब की केंद्र सरकार ने इसमें कोई रुचि नहीं दिखाई थी. मौजूदा सरकार ने उस दिशा में क्या कदम उठाये और उनके क्या नतीजे आये, इसे देश को बताया जाना चाहिए. वैसे खबर है कि कोई सूची केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को सौंपी है.
एक भूली-बिसरी याद
आजादी के बाद के पहले दशक की बात है. डाॅ अनुग्रह नारायण सिन्हा बिहार के वित्त मंत्री थे. किसी सरकारी काम से सुबह के विमान से दिल्ली पहुंचे. कांग्रेसी सांसद सारंगधर सिन्हा के आवास पर गये. अनुग्रह बाबू ने कहा,‘ऐ सांरधर, बड़ी भूख लगी है. कुछ नाश्ता कराओ.’ पटना से लोकसभा के सदस्य सारंगधर बाबू ने कहा कि ‘आपको जहाज में नाश्ता नहीं मिला?’ इस पर अनुग्रह बाबू ने जवाब दिया, ‘मिलता तो है, पर बहुत पैसा लग जाता है.’ जाहिर है कि अनुग्रह बाबू को यात्रा के लिए टीए-डीए मिलता होगा.
पर वे सरकार का पैसा उस पर खर्च करना नहीं चाहते थे. सन् 1977 में पटना के एक्जीविशन रोड स्थित उनके आवास पर सारंगधर बाबू से मिलने का अवसर मुझे मिल जाता था. हालांकि वे श्री बाबू के गुट में थे. वे बारी-बारी से पटना व रांची विश्वविद्यालय के वीसी भी रह चुके थे. अनुग्रह बाबू के भी सद्गुणों की चर्चा करते थे. जरा आज के नेताओं से अनुग्रह बाबू जैसे नेता की तुलना कर लीजिए! अनुग्रह बाबू के सरकारी आवास के बड़े कमरे में दरी बिछी हुई थी.
उस दरी के ऊपर से फोन का तार गुजर रहा था. किसी ने सलाह दी कि दरी को छेद कर तार को नीचे से गुजार दिया जाये. इस पर अनुग्रह बाबू ने कहा कि इससे दरी खराब हो जायेगी. सरकारी चीज को इस तरह खराब करना ठीक नहीं होगा. परिणामस्वरूप तार दरी के ऊपर ही रहा. एक दिन अनुग्रह बाबू का पैर उस तार में उलझ गया. वे गिर पड़े. उन्हें चोट आयी. उस चोट से वे उबर नहीं सके. उनका निधन हो गया.
और अंत में :
इन दिनों कुछ नेता व पत्रकार राफेल लड़ाकू विमान खरीद सौदे की तुलना बोफर्स तोप सौदे से कर रहे हैं. पर ऐसी तुलना जल्दबाजी ही कही जायेगी. क्योंकि, बोफर्स सौदे के दलाल के स्विस खाते का नंबर 1988 में ही प्रकाश में आ गया था. पर राफेल सौदे के मामले में ऐसे किसी खाते या दलाल का अता-पता नहीं है. यहां यह नहीं कहा जा रहा है कि ऐसा कुछ है ही नहीं. यदि कुछ है भी तो उसे बाहर तो आने दीजिए. फिर राफेल की तुलना बोफर्स से कर लीजिएगा.
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