भूमि की उर्वरा शक्ति को घटा रहा है ईंट बनाने का धंधा

Updated at : 05 Jul 2018 9:09 AM (IST)
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भूमि की उर्वरा शक्ति को घटा रहा है ईंट बनाने का धंधा

राज्य की दस लाख हेक्टेयर भूमि हो रही प्रभावित अनिकेत त्रिवेदी पटना : इसे विकास का साइड इफेक्ट कहें या प्राकृतिक संसाधनों के बेतहाशा दोहन का परिणाम, सच्चाई सामने आयी है कि ईंट बनाने में जमीन का अंधा-धुंध उपयोग कृषि योग्य भूमि की उर्वरा को घटा दे रहा है. प्रदेश में करीब दस लाख हेक्टेयर […]

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राज्य की दस लाख हेक्टेयर भूमि हो रही प्रभावित
अनिकेत त्रिवेदी
पटना : इसे विकास का साइड इफेक्ट कहें या प्राकृतिक संसाधनों के बेतहाशा दोहन का परिणाम, सच्चाई सामने आयी है कि ईंट बनाने में जमीन का अंधा-धुंध उपयोग कृषि योग्य भूमि की उर्वरा को घटा दे रहा है. प्रदेश में करीब दस लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि ईंट निर्माण के धंधे से प्रभावित हो चुकी है. यह निष्कर्ष प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक आधिकारिक अध्ययन में सामने आया है. इसका सीधा असर हमारे खान-पान की गुणवत्ता प्रभावित करेगा, जो बेहद खतरनाक होगा.
मिट्टी की खुदाई से घट रही है उर्वरा शक्तिबिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण परिषद के शोध में बताया गया है कि बगैर मानक का ख्याल किये और बाजार मांग को पूरा करने के लिए तेजी से की जा रही मिट्टी की खुदाई मृदा की उर्वरा शक्ति को नष्ट कर रही है.
दरअसल मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बरकरार रखने वाली ऊपरी परत पर पायी जाने वाली ह्यूमस मृदा की खुदाई में नष्ट हो जाती है.
इसकी वजह से खेती की उपजाऊ क्षमता घट जाती है. इसे रोकने के लिए किसान रासायनिक उर्वरकों और कीट नाशकों का उपयोग बढ़ा रहे हैं, जिसके दुष्परिणाम कई रूप में सामने आते हैं. इसके अलावा बाढ़ क्षेत्रों में इस तरह की खुदाई कटाव व बाढ़ की आशंका को भी बढ़ा देती है.
50 अरब तक होने वाला है ईंट निर्माण
राज्य में लगभग 20 अरब ईंटें बनायी जाती हैं. निकट भविष्य में ईंट निर्माण का कारोबार 50 अरब तक पहुंचने वाला है. ऐसे में इसका सीधा मतलब है कि बाजार के मांग को पूरा करने के लिए खेतों की खुदाई, ऊपरी मृदा का दोहन और तेजी से बढ़ने वाला है. जानकारी के मुताबिक रेड ब्रिक्स के निर्माण में कोयले का प्रयोग भी अधिक होता है. इससे कार्बन उत्सर्जन की मात्रा बढ़ जाती है. इस हिसाब से ईंट निर्माण मृदा प्रदूषण के अलावा वायु प्रदूषण भी बढ़ा रहा है.
मगर हो रही सुस्ती
राज्य में ईंट उद्योग में फ्लाई ऐश के उपयोग के लिए वर्ष में 2012 में टास्क फोर्स का गठन किया गया था. शहर के निकट पांच प्रखंडों में 120 ईंट भट्ठों में उसके प्रयोग की पहल की गयी थी. वहीं इस वर्ष 31 अगस्त फ्लाई ऐश का उपयोग नहीं करने वाले भट्ठों को प्रदूषण नियंत्रण परिषद की अोर से एनओसी नहीं दी जायेगी. हालांकि फिलहाल इसकी जांच को लेकर सुस्ती बरती जा रही है.
फ्लाई ऐश हो सकता है विकल्प
ईंट निर्माण में मिट्टी का उपयोग कम करने के लिए नये विकल्प की तलाश की जा रही है. डॉक्टर अशोक घोष बताते हैं कि रेड ब्रिक निर्माण में फ्लाई ऐश का प्रयोग किया जा सकता है. ईंट में लगभग 25 फीसदी फ्लाई ऐश का प्रयोग किया जा सकता है. इससे रेड ब्रिक की मजबूती भी नहीं घटती है. उन्होंने बताया कि देश के थर्मल पावर प्रोजेक्टों से लगभग 11 करोड़ टन फ्लाई ऐश का उत्पादन होता है. जिसका 14 प्रतिशत उपयोग ईंट निर्माण में किया जा सकता है. ताकि ईंट निर्माण में मिट्टी पर निर्भरता को कम किया जा सके.
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