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7वें दिन मां कालरात्रि की पूजा से होता है इस ऊर्जा का संचार, इस मंत्र के साथ करें पूजा

Updated at : 26 Sep 2017 3:01 PM (IST)
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7वें दिन मां कालरात्रि की पूजा से होता है इस ऊर्जा का संचार, इस मंत्र के साथ करें पूजा

पटना : नवरात्र में हर दिन का अपना अलग-अलग महत्व है. नवदुर्गा के पूजन से सबके कष्ट दूर होते हैं. इन्हीं में से एक पूजा होती है नवरात्र के सातवें दिन मां कालरात्रि की. इनकी पूजा करने से भक्तों के सार कष्ट, भूत, प्रेत के साथ सारी बाधा दूर हो जाती है. ज्योतिषविद् डॉ. श्रीपति […]

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पटना : नवरात्र में हर दिन का अपना अलग-अलग महत्व है. नवदुर्गा के पूजन से सबके कष्ट दूर होते हैं. इन्हीं में से एक पूजा होती है नवरात्र के सातवें दिन मां कालरात्रि की. इनकी पूजा करने से भक्तों के सार कष्ट, भूत, प्रेत के साथ सारी बाधा दूर हो जाती है. ज्योतिषविद् डॉ. श्रीपति त्रिपाठी कहते हैं कि मां कालरात्रि कालों के काल हैं.मां का स्वरूप भयंकर है, लेकिन शुभकारी एवं सुखकारी है.मां के स्वरूप से सभी प्रकार के ग्रह दोष संबंधी दोष दूर हो जाते है.कालरात्रि देवी मां के सबसे क्रूर,सबसे भयंकर रूप का नाम है.

दुर्गा का यह रूप ही प्रकृति के प्रकोप का कारण है.मां कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक हैलेकिन यह सदैव शुभ फल ही देने वाली हैं. इसी कारण इनका एक नाम‘शुभंकारी’भी है. अतः इनसे भक्तों को किसी प्रकार भी भयभीत अथवा आतंकित होने की आवश्यकता नहीं है. इनके शरीर का रंग घने अंधकार की तरह एकदम काला है. सिर के बाल बिखरे हुए हैं. गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है. इनके तीन नेत्र हैं. ये तीनों नेत्र ब्रह्मांड के सदृश गोल हैं. इनसे विद्युत के समान चमकीली किरणें निःसृत होती रहती हैं.

मां कालरात्रि दुष्टों का विनाश करने वाली हैं. दानव,दैत्य,राक्षस,भूत,प्रेत आदि इनके स्मरण मात्र से ही भयभीत होकर भाग जाते हैं. यह ग्रह-बाधाओं को भी दूर करने वाली हैं. इनके उपासकोंको अग्नि-भय,जल-भय,जंतु-भय,शत्रु-भय,रात्रि-भय आदि कभी नहीं होते. इनकी कृपा से वह सर्वथा भय-मुक्त हो जाता है. मां दुर्गा के कालरात्रि रूप की उपासना करने के लिए निम्‍न मंत्र की साधना करना चाहिए. मां के इस स्वरूप से प्रत्यक्ष-परोक्ष एवं वर्तमान दृश्य-अदृश्य आकार-विकार को दूर करके नये ऊर्जा से सरोबार तरोताजा करने वाली स्वरूपा हैं मां कालरात्रि. मंत्र:-या देवी सर्वभू‍तेषु मां कालरात्रि रूपेण संस्थिता. नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

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