बिहार के वैज्ञानिकों ने बनाया सबसे सस्ता वाटर फिल्टर, पानी से सोख लेगा आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसा जहर

Updated at : 27 Mar 2026 2:23 PM (IST)
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Bihar News

सबसे सस्ता वाटर फिल्टर का मॉडल

Patna News: पटना से एक ऐसी खोज सामने आई है, जो देश में पीने के पानी की बड़ी समस्या का सस्ता समाधान बन सकती है. यहां के वैज्ञानिकों ने अंडे के छिलकों से एक खास वाटर फिल्टर तैयार किया है, जो पानी में मौजूद आर्सेनिक, फ्लोराइड जैसे खतरनाक तत्वों को खत्म कर देता है.

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Patna News: पटना के वैज्ञानिकों ने कचरे में फेंके जाने वाले ‘अंडे के छिलकों’ से पानी साफ करने का एक नायाब ‘देसी जुगाड़’ विकसित कर लिया है. यह तकनीक न केवल सस्ती है, बल्कि पानी में घुले कैंसरकारी आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे घातक तत्वों को जड़ से खत्म करने की ताकत रखती है. बिहार की इस खोज को अब भारत सरकार ने ‘पेटेंट’ की मुहर भी लगा दी है.

7 साल की मेहनत के बाद मिली सफलता

आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय (AKU) के स्कूल ऑफ नैनोसाइंस एवं नैनोटेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने कर दिखाया है. डॉ. राकेश कुमार सिंह, डॉ. अभय कुमार अमन और शोधकर्ता आशुतोष कुमार की टीम ने साल 2016 से इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया था.

वैज्ञानिकों ने बेकार समझे जाने वाले अंडे के छिलकों को प्रोसेस कर उन्हें ‘कैल्शियम ऑक्साइड नैनो पार्टिकल्स’ में बदल दिया. इन सूक्ष्म कणों में जहरीले तत्वों को चुंबक की तरह सोखने की अद्भुत क्षमता पाई गई है, जो महंगे फिल्टरों को भी मात दे रही है.

कैसे काम करती है यह ‘अंडा तकनीक’?

इस तकनीक की कार्यप्रणाली जितनी सरल है, उतनी ही प्रभावी भी. जब अंडे के छिलकों से बने इन नैनो पार्टिकल्स को प्रदूषित पानी में डाला जाता है, तो ये पानी में मौजूद आर्सेनिक, लेड (सीसा) और फ्लोराइड को बेहद तेजी से सोख लेते हैं.

इतना ही नहीं, यह तकनीक पानी के भीतर मौजूद डायरिया फैलाने वाले बैक्टीरिया और अन्य विषाणुओं को भी नष्ट कर देती है. मनेर और उत्तर बिहार के उन इलाकों के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं है, जहां का पानी पीने से लोग कैंसर और हड्डियों की बीमारियों का शिकार हो रहे हैं.

संजीवनी’ बनेगा यह देसी फिल्टर

बिहार के कई जिलों में आर्सेनिक की मात्रा सामान्य से कहीं ज्यादा है, जिससे गरीब तबका सबसे ज्यादा प्रभावित होता है. महंगे वाटर फिल्टर खरीदना हर किसी के बस की बात नहीं है, ऐसे में अंडे के छिलके से बनी यह तकनीक पानी को ‘अमृत’ बनाने का काम करेगी.

यह तकनीक न केवल बिहार, बल्कि राजस्थान और झारखंड जैसे राज्यों के लिए भी गेम-चेंजर साबित होगी, जहां फ्लोराइड की समस्या है.

पेटेंट की मुहर

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह शोध केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहेगा. 2023 में मिली सफलता के बाद अब इसे बड़े पैमाने पर बाजार में उतारने की तैयारी है.

भारत सरकार ने इस देसी तकनीक को पेटेंट दे दिया है, जिससे इसकी उपयोगिता और विश्वसनीयता साबित होती है. अब उम्मीद की जा रही है कि इसे बड़े स्तर पर लागू किया जाएगा, जिससे गरीब और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों को शुद्ध पानी मिल सके.

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Pratyush Prashant

लेखक के बारे में

By Pratyush Prashant

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.

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