जान बचाने की आड़ में बड़ा खेल

Updated at : 15 Apr 2017 8:41 AM (IST)
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जान बचाने की आड़ में बड़ा खेल

जानकारी के अभाव में रक्तदान करने से हिचकते हैं लोग सदर अस्पताल में रिप्लेसमेंट के आधार पर मिलता है ब्लड नवादा नगर : प्रसव, सड़क दुर्घटना या अन्य बीमारियों में जरूरत पड़ने पर जिले में ब्लड मिल पाना मुश्किल है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार जिले में एक भी प्राइवेट स्तर पर ब्लड बैंक नहीं है, […]

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जानकारी के अभाव में रक्तदान करने से हिचकते हैं लोग
सदर अस्पताल में रिप्लेसमेंट के आधार पर मिलता है ब्लड
नवादा नगर : प्रसव, सड़क दुर्घटना या अन्य बीमारियों में जरूरत पड़ने पर जिले में ब्लड मिल पाना मुश्किल है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार जिले में एक भी प्राइवेट स्तर पर ब्लड बैंक नहीं है, लेकिन प्रतिदिन निजी क्लिनिकों व सरकारी अस्पतालों में मरीजों को जरूरत के मुताबिक खून उपलब्ध कराने के लिए मुंहमांगी कीमत वसूल की जाती है. रेयर ब्लड ग्रुप माने जानेवाले नेगेटिव ग्रुप के ब्लड की कीमत तो आसमान पर होती है. खून का यह कारोबार धड़ल्ले से बिन लाइसेंस के चल रहा है. रुपये के कारण खून बेचनेवाले कुछ लोगों को तैयार कर यह खून की उपलब्धता करायी जाती है. जिला मुख्यालय में कई ब्लड बैंक स्वास्थ्य विभाग की अनुमति के बगैर संचालित हैं, जहां सामान्य रूप से बी-पॉजीटिव ग्रुप के ब्लड भी दो से तीन हजार रुपये प्रति यूनिट पर मिलता है. एडिक्टेड लोगों के द्वारा दिये जानेवाले इस ब्लड में हेमोग्लोबिन की कम मात्रा के साथ ही कई हानिकारक अवयवभी रहते हैं, जो बाद में मरीजों के लिए दूसरी बीमारी का भी कारण बनते हैं.
स्वैच्छिक रक्तदान से आता है ब्लड
ब्लड बैंक में शिविरों या स्वैच्छिक रक्तदान के माध्यम से प्राप्त खून मरीजों को चढ़ाये जाते हैं. जिले में बजरंग दल, विद्यार्थी परिषद, एचडीएफसी बैंक आदि के द्वारा शिविर लगाकर या स्वैच्छिक रक्तदान के माध्यम से शिविर में अक्सर रक्तदान किया जाता है. रक्तदान के पहले रक्तदान करनेवालों की शारीरिक जांच की जाती है. वजन 45 किलो से कम नहीं हो, रक्तदाता 18 साल से ऊपर का हो, हिमोग्लोबिन की मात्रा, 12.5 ग्राम के आसपास हो, बीपी, शुगर आदि नार्मल हो, इसके साथ ही असाध्य रोगों या दवा लिये जाने आदि की जानकारी के बाद रक्त लिया जाता है.
सदर अस्पताल में बना है सरकारी ब्लड बैंक
सदर अस्पताल में बना ब्लड बैंक अस्पताल में भरती होनेवाले रोगियों के लिए वरदान है. अस्पताल में सामान्य रूप से रिप्लेसमेंट के आधार पर ब्लड दिये जाते हैं. यानी एक यूनिट खून के बदले में मरीज के किसी परिजन से एक यूनिट खून निकाला जाता है. इसके बदले में मरीज के जरूरत के ब्लड ग्रुप का खून मरीज को चढ़ाया जाता है. अस्पताल में पहुंचनेवाले तत्काल दुर्घटना के मरीज, प्रसव, थाइलिसीमिया, एचआइबी, हिमोफिलिया आदि बीमारियों के मरीजों के साथ ही लावारिस मरीजों को अस्पताल प्रशासन के निर्देश के बाद सीधे ब्लड उपलब्ध करा दिया जाता है.
35 दिन तक रक्त रहता है सुरक्षित
जिले में 350 यूनिट खून को सुरक्षित रखने की व्यवस्था है. एक सैंपल को अधिकतम 35 दिनों तक रखा जा सकता है. इसके बाद खून का वह यूनिट बेकार हो जाता है. जिले में अब तक कभी भी एक्सपायर कर ब्लड बेकार नहीं हुआ है. ब्लड बैंक के टेक्निशियन कृष्णनंदन कुमार, दर्पण कुमार, उमेश कुमार वर्मा, अशोक कुमार आदि ने कहा कि ब्लड डोनेशन में आये रक्त को नियम के अनुसार मरीजों को दिया जाता है. ब्लड डोनेट करनेवालों को एक कार्ड दिया जाता है. इससे वह राज्य भर में कहीं भी जरूरत पड़ने पर जितना ब्लड उन्होंने दान किया है, उतना ब्लड उपलब्ध रहने पर प्राप्त कर सकते हैं.
क्या कहते हैं अधिकारी
जिले में सरकारी अस्पताल के ब्लड बैंक के अलावा किसी भी ब्लड बैंक को मान्यता नहीं दी गयी है. कहीं भी ब्लड बैंक चलने की जानकारी नहीं है. संज्ञान में आने पर कार्रवाई होगी. स्वास्थ्य विभाग की ओर से किसी को भी ब्लड बैंक चलाने का लाइसेंस नहीं दिया गया है. अगर कोई ब्लड बैंक चल रहा है, तो वह अवैध है.
डॉ श्रीनाथ प्रसाद, सीएस, सदर अस्पताल
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