आज से मांगलिक कार्यों की होगी शुरुआत

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 08 Nov 2019 9:27 AM

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नवादा : कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष एकादशी को देवउठानी एकादशी व्रत को लेकर बाजार में गन्ने की बिक्री चारम पर रही. इस पर्व के लिए बाजार में गन्ने की दाम 10 रुपये से 30 रुपये तक रही. इस पर्व को देवोत्थान एकादशी, देवउठानी ग्यारस, प्रबोधिनी एकादशी के नामों से भी जाना जाता है. ऐसी […]

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नवादा : कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष एकादशी को देवउठानी एकादशी व्रत को लेकर बाजार में गन्ने की बिक्री चारम पर रही. इस पर्व के लिए बाजार में गन्ने की दाम 10 रुपये से 30 रुपये तक रही. इस पर्व को देवोत्थान एकादशी, देवउठानी ग्यारस, प्रबोधिनी एकादशी के नामों से भी जाना जाता है.

ऐसी मान्यता है कि भगवान विष्णु क्षीर सागर में चार महीने की निंद्रा के बाद जागते हैं. अषाढ़ शुक्ल पक्ष के एकादशी को भगवान विष्णु अपने चार माह की निद्रा में चले जाते है और कार्तिक मास एकादशी के दिन भगवान विष्णु जागते हैं. इनके जागने के बाद से सभी तरह के शुभ और मांगलिक कार्य आरंभ हो जाते हैं. इस बार देवउठनी एकादशी व्रत शुक्रवार को मनाया जा रहा है. देवउठनी एकादशी के दिन ही तुलसी विवाह किया जाता है.
इस दिन तुलसी जी का विवाह शालिग्राम से किया जाता है. कहा जाता है कि अगर किसी व्यक्ति को कन्या नहीं है और वह जीवन में कन्यादान का सुख प्राप्त करना चाहते हैं तो वह तुलसी विवाह कर अपनी मनोकामना पूरी कर सकते है.
इतना ही नहीं जिनका दाम्पत्य जीवन बहुत अच्छा नहीं है, वैसे लोग भी सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए तुलसी विवाह करते हैं. युवाओं को तुलसी विवाह करवाना चाहिए. ब्राह्मण महासभा के पंडित विद्याधर पांडेय बताते हैं कि तुलसी विवाह करवाने से कई जन्मों के पाप नष्ट होते हैं. तुलसी पूजा करवाने से घर में संपन्नता आती है तथा संतान योग्य होती है.
तुलसी पूजा से प्रसन्न होते हैं भगवान विष्णु : भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी का विशेष स्थान है. पंडित जी बताते हैं कि जब तक भगवान विष्णु के भोग में तुलसी नहीं होती तब तक भगवान उसे ग्रहण नहीं करते हैं.
इसलिए प्रसाद के रूप में तुलसी जरूर चढ़ाएं. भगवान विष्णु को तुलसी ने अपने सिर पर स्थान दिया है इसलिए एक पत्ता उनके सिर पर रखने के बाद भोग पर भी रखें. पंडित जी बताते हैं कि एकादशी पर भगवान विष्णु को तुलसी की माला अर्पित करना चाहिए.
गन्ना चढ़ा कर किसान करते हैं फसल कटनी
एकदाशी के दिन भगवान विष्णु को भोग में गन्ना अर्पित करने और गन्ने का मंडप बनाकर पूजा करने की परंपरा है. बताया जाता है कि ऐसा करने से घर में हमेशा सुख-शांति रहती है. कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन को ही किसान गन्ने को भगवान पर अर्पित कर अगले दिन से फसल काटना भी शुरू करते हैं.
इसके अलावा इस पर्व पर तिल दान करने से कभी नरक के दर्शन नहीं होते हैं. एकादशी के दिन तिल का भोग लगाने से सभी तरह के पापों से मुक्ति मिलती है. इस दिन तिल के दान का विशेष महत्व है. इसी दिन से तिलकुट की बिक्री शुरू किया जाता है. शहर के बाजारों में देवोत्थान पर्व को लेकर करीब दो टन गन्ना मंगाया गया है.
करीब 25 गाड़ियों से लगभग दो लाख गन्ना शहर पहुंचा है, जिससे पूरा शहर गन्ने से पट गया है. इस बार पिछले साल से 10 रुपये सस्ता गन्ना लोगों को मिल रही है. पिछले साल 20-40 रुपये गन्ने का रेट था. इस साल 10 रुपये से 30 रुपये पीस गन्ना बाजार में बिक रहा है. इसका सबसे बड़ी कारण है कि जो भी गन्ना की आपूर्ति की गयी है, वह जिले का ही पैदावार है. इससे किसानों के आय भी बढ़ी है. लोकल गन्ने में मिठास काफी रहने व सस्ते दर पर आसानी से उपलब्ध हो जाने से सस्ता है.
क्यों मनाया जाता है देवोत्थान एकादशी
कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष एकादशी को देवोत्थान एकादशी के नाम से जाना जाता है. यह एकादशी दीपावली के बाद आती है और इस दिन को लेकर लोगों में ऐसी मान्यता है कि देवोत्थान एकादशी के दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में अपने चार माह के शयन के पश्चात जागते हैं और उनके जागने पर ही सभी शुभ मांगलिक कार्य किये जाते है.
बोले ज्योतिषाचार्य
देवोत्थान के साथ ही शुभ लगन शुरू हो जाती है. इस बार देवोत्थान के एक दिन पूर्व गुरुवार को विशाखा के रवि हो जाने के कारण शुभ लगन 20 नंबर से शुरू होगा. इसी दिन शाम 7.37 बजे पर अनुराधा के रवि हो जाने से शुभ लगन शुरू हो जायेगा. कुल मिला कर नवंबर और दिसंबर में मात्र 13 लगन ही हैं. इसमें शादी ब्याह किया जा सकेगा. साथ ही वृश्चिक की संक्रांति भी 17 नवंबर को हो जायेगी. नवंबर माह में शुभ लगन- 20, 21, 22, 23, 24, 28 व 30 तक तथा दिसंबर माह में 01, 05, 07, 08, 11 व 12 को ही शादी ब्याह का शुभ लगन रहेगा. इसके बाद शुक्रास्त दोष होने के कारण शुभ कार्य बंद हो जायेगा.
धर्मेंद्र झा, ज्योतिषाचार्य
देवोत्थान का पारण नौ नवंबर की सुबह
देवोत्थान एकादशी का पर्व आठ नवंबर, शुक्रवार को मनाया जायेगा. इस वर्ष इस पर्व का मुहूर्त सात नवंबर को रात 9.55 बजे से आरंभ होगा और इसका समापन अगले दिन आठ नवंबर की मध्य रात्रि 12.24 बजे होगी.
देवोत्थान एकादशी के पर्व में पारण समय का काफी महत्व रखता है, जिसके अनुसार व्रत खोला जाता है. ज्योतिषिचार्य धर्मेंद्र झा बाताते हैं कि इस वर्ष देवोत्थान एकादशी के लिए पारण का समय नौ नवंबर के दिन सुबह में 6.42 से 8.51 के बीच निर्धारित किया गया है और श्रद्धालुओं द्वारा व्रत खोलने के लिए यही समय सबसे उत्तम है.
देवोत्थान एकादशी व्रत के लिए गन्ने से पटा बाजार
10 से लेकर 30 रुपये पीस बिक रहा गन्ना
नवादा : कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष एकादशी को देवउठानी एकादशी व्रत को लेकर बाजार में गन्ने की बिक्री चारम पर रही. इस पर्व के लिए बाजार में गन्ने की दाम 10 रुपये से 30 रुपये तक रही. इस पर्व को देवोत्थान एकादशी, देवउठानी ग्यारस, प्रबोधिनी एकादशी के नामों से भी जाना जाता है.
ऐसी मान्यता है कि भगवान विष्णु क्षीर सागर में चार महीने की निंद्रा के बाद जागते हैं. अषाढ़ शुक्ल पक्ष के एकादशी को भगवान विष्णु अपने चार माह की निद्रा में चले जाते है और कार्तिक मास एकादशी के दिन भगवान विष्णु जागते हैं. इनके जागने के बाद से सभी तरह के शुभ और मांगलिक कार्य आरंभ हो जाते हैं. इस बार देवउठनी एकादशी व्रत शुक्रवार को मनाया जा रहा है. देवउठनी एकादशी के दिन ही तुलसी विवाह किया जाता है.
इस दिन तुलसी जी का विवाह शालिग्राम से किया जाता है. कहा जाता है कि अगर किसी व्यक्ति को कन्या नहीं है और वह जीवन में कन्यादान का सुख प्राप्त करना चाहते हैं तो वह तुलसी विवाह कर अपनी मनोकामना पूरी कर सकते है.
इतना ही नहीं जिनका दाम्पत्य जीवन बहुत अच्छा नहीं है, वैसे लोग भी सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए तुलसी विवाह करते हैं. युवाओं को तुलसी विवाह करवाना चाहिए. ब्राह्मण महासभा के पंडित विद्याधर पांडेय बताते हैं कि तुलसी विवाह करवाने से कई जन्मों के पाप नष्ट होते हैं. तुलसी पूजा करवाने से घर में संपन्नता आती है तथा संतान योग्य होती है.
तुलसी पूजा से प्रसन्न होते हैं भगवान विष्णु : भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी का विशेष स्थान है. पंडित जी बताते हैं कि जब तक भगवान विष्णु के भोग में तुलसी नहीं होती तब तक भगवान उसे ग्रहण नहीं करते हैं.
इसलिए प्रसाद के रूप में तुलसी जरूर चढ़ाएं. भगवान विष्णु को तुलसी ने अपने सिर पर स्थान दिया है इसलिए एक पत्ता उनके सिर पर रखने के बाद भोग पर भी रखें. पंडित जी बताते हैं कि एकादशी पर भगवान विष्णु को तुलसी की माला अर्पित करना चाहिए.
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