हुजूर! घर में तो ठीक है, पर बाहर नेचरल कॉल से कैसे निबटूं
Updated at : 24 Aug 2018 4:17 AM (IST)
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शहर के यूरिनल हुए बेकार, साफ-सफाई का नहीं है इंतजाम नवादा नगर : शहर में बने सार्वजनिक शौचालय उन्हें मुंह चिढ़ा रहे हैं, जो स्वच्छता अभियान के नाम पर फोटो खिंचवाने में लगे रहते हैं़ इनमें नेताओं व अफसरों के अलावा समाज को जागरूक करने की बात करनेवाले भी शामिल हैं़ विभिन्न आयोजनों पर प्रशासन […]
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शहर के यूरिनल हुए बेकार, साफ-सफाई का नहीं है इंतजाम
नवादा नगर : शहर में बने सार्वजनिक शौचालय उन्हें मुंह चिढ़ा रहे हैं, जो स्वच्छता अभियान के नाम पर फोटो खिंचवाने में लगे रहते हैं़ इनमें नेताओं व अफसरों के अलावा समाज को जागरूक करने की बात करनेवाले भी शामिल हैं़
विभिन्न आयोजनों पर प्रशासन के अलावा मीडिया की सुर्खियां बटोरनेवाले नेताओं व समाजसेवी भी शहर में शौचालय की समस्या पर मौन साधे रहते हैं़ शहरी क्षेत्र में हर दिन बाहर से हजारों लोग आते हैं़ बावजूद शहर में एक भी कामयाब सुलभ शौचालय नहीं है़ इसके चलते आमलोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है. शहर में कुछ स्थानों पर बने यूरिनल व शौचालय बेकार हो गये हैं़ हाल यह है कि नाक पर रूमाल रख कर भी लोग इसका इस्तेमाल नहीं कर सकते़
प्रजातंत्र चौक पर बना यूरिनल ऐसा दिखता है, मानों कई माह से इसकी सफाई नहीं की गयी है़ पास में बने पुस्तकालय के गेट तक लोग खुले में शौच व यूरीन करने को विवश हैं. प्रशासन के स्वच्छता अभियान की इससे बुरी स्थिति शायद ही कहीं देखने को मिलेगी. मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में हर घर पक्का शौचालय बनवाया गया लेकिन उसी गांव के लोग जब बाजार में आयेंगे तो कहां शौच करेंगे,इसकी व्यवस्था शहर में कहीं नहीं है़ नगर पर्षद की ओर से पिछले सत्र में शहर में लगभग 25 स्थानों पर यूरिनल का निर्माण कराया गया था़ लेकिन, यह सभी यूरिनल बेकार साबित हो रहे हैं़
जिन यूरिनल को सोख्ता के आधार पर बनाया गया था, उसमें गंदगी का अंबार है. शहरी क्षेत्र में लोगों की सुविधा के लिए बने सभी यूरिनल रखरखाव नहीं होने तथा बनाने में लापरवाही के कारण आज बेकार हो गये हैं. पीएम मोदी 2019 तक स्वच्छता के नये मापदंड बनाने की बात कह रहे हैं, जबकि जिला मुख्यालय कागज पर ही स्वच्छ नवादा बनाकर वाह-वाही लेने की होड़ में लगा है.
महिलाएं और लड़कियां होती हैं शर्मसार
शहर में काम से निकलनेवाली महिलाओं को हर हाल में अपने नेचरल कॉल को रोकना होता है. कॉलेज व स्कूलों में पढ़ने आनेवाली छात्राओें को इस समस्या का सबसे अधिक सामना करना होता है. छात्राओं व लड़कियों को मजबूरी में पेड़ की आड़ लेकर शौचालय के लिए विवश होना पड़ रहा है. सभ्य समाज में इससे बड़ी शर्मिंदगी क्या हो सकती है कि लोग अपने नेचुरल कॉल को भी सही तरीके से पूरा नहीं कर सकते हैं. गांवों से आकर मार्केटिंग करने वाली महिलाओं को भी इसी प्रकार की समस्या का सामना करना होता है. बस स्टैंड या रेलवे स्टेशन पर भी शौचालय का इंतजाम सही से नहीं है.
शौचालयों की सफाई पर दिया जा रहा ध्यान
शौचालय की व्यवस्था हो, इसके लिए प्रयास हो रहा है. नियमित रूप से शौचालय की सफाई हो, इसका प्रयास होता है. यदि गंदगी है, तो इसे ठीक कराया जायेगा.
पूनम चंद्रवंशी, नप अध्यक्ष
क्या कहते हैं लोग
खरीदारी के लिए बाजार आने के पहले तैयारी कर निकलना पड़ता है. अगर लंबे समय तक हमलोगों को बाहर रहना पड़ता है, तो काफी परेशानी होती है. शहर में कही भी फ्रेश होने की जगह नहीं है. प्रशासन को सोचना चाहिए.
श्वेता रानी, हिसुआ
शहर में कहीं भी लड़कियों के लिए शौचालय की सुविधा नहीं है. ट्यूशन व कोचिंग के कई संस्थानों में भी टॉयलेट नहीं है. लड़कियां किस कष्ट से रहती हैं यह कहा नहीं जा सकता है.
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