गुरु के प्रति शिष्य हरिश्चंद्र दास ने दिखायी निष्ठा, एक एकड़ में 48 लाख की लागत से बनाया रामकृष्ण धाम

Updated at : 17 Apr 2022 4:16 PM (IST)
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गुरु के प्रति शिष्य हरिश्चंद्र दास ने दिखायी निष्ठा,  एक एकड़ में 48 लाख की लागत से बनाया रामकृष्ण धाम

गुरु के प्रति असीम निष्ठा के कारण हरिश्चंद्र दास ने बोचहां के गड़हा स्थित अपनी एक एकड़ जमीन में 48 लाख की लागत से राम-कृष्ण धाम मंदिर बना दिया और उसका नाम आचार्य जानकीवल्लभ सेवा सदन रखा.

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गुरु-शिष्य परंपरा भारतीय संस्कृति की विरासत रही है. गुरु ने न केवल ज्ञान दिया, बल्कि भक्ति धारा से जोड़ कर परमात्मा से साक्षात्कार भी कराया. गुरु केवल ज्ञान का स्रोत नहीं होते थे, बल्कि जीने का तरीका भी सिखाते थे. गुरु ने जो बात कह दी, उसका पालन शिष्य अपने प्राण देकर भी करते थे. आज यह बातें भले ही एक कहानी लगे, लेकिन अब भी दुनिया में ऐसे लोग हैं जो गुरु-शिष्य परंपरा को पहले की तरह निभा रहे हैं. ऐसे ही शख्स मशहूर गीतकार हरिश्चंद्र दास हैं. महाकवि जानकीवल्लभ शास्त्री के प्रिय इस शिष्य ने अपनी गुरु भक्ति का ऐसा नजारा पेश किया है कि लोग हैरत में पड़ जाते हैं.

48 लाख की लागत से बनाया राम-कृष्ण धाम मंदिर

गुरु के प्रति असीम निष्ठा के कारण हरिश्चंद्र दास ने बोचहां के गड़हा स्थित अपनी एक एकड़ जमीन में 48 लाख की लागत से राम-कृष्ण धाम मंदिर बना दिया और उसका नाम आचार्य जानकीवल्लभ सेवा सदन रखा. यहां स्थापित मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा भी महाकवि ने खुद की थी. अब इस मंदिर में महाकवि जानकीवल्लभ की प्रतिमा लगायी जा रही है. हरिश्चंद्र दास ने महाकवि को वचन दिया था कि वे उनके नाम पर मंदिर बना कर समाज सेवा करेंगे और महाकवि के जीवन काल में ही मंदिर की शुुरुआत कर प्राण प्रतिष्ठा करा ली.

पढ़ाई के दौरान आचार्य का गीत पढ़कर हो गये थे मुरीद

हरिश्चंद्र दास बताते हैं कि कोस की किताब में महाकवि के गीत मेरे पथ में न विराम रहा पढ़ा था. स्कूल के शिक्षक ने बताया कि गीत लिखने वाले आचार्य मुजफ्फरपुर में ही रहते हैं तो उनसे मिलने की इच्छा जाग गयी. मैं 1966 में मैट्रिक का छात्र था. आचार्य से मिलने उनके घर गया. बहुत सारे लोग बैठे हुए थे. बात करने की उनसे हिम्मत नहीं हो रही थी. तीन घंटे तक बैठा रहा. आचार्य मुझे देखते रहे. इसके बाद उनके पैर छूकर निकल आया. जाते समय आचार्य ने कहा था, फिर आना.

इसके बाद से जाने का सिलसिला बन गया. मैंने गीत लिखना शुरू किया. आचार्य देखते थे और मुझे बताते भी थे. उनकी प्रेरणा से गीतकार बना. आचार्य हमेशा कहते थे कि जीवन में ऐसा काम करो, जिससे समाज का भला हो सके. मैंने सोच लिया था कि एक मंदिर बनाऊंगा और उसे आचार्य को समर्पित करूंगा. 1986 में मंदिर की नींव रखी. इसका भूमि पूजन और मंदिर बनने के बाद प्राण-प्रतिष्ठा भी आचार्य ने खुद किया.

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अनूप जलोटा और उषा मंगेशकर गा चुकी हैं भजन

हरिश्चंद्र के दर्जनों गीत अनूप जालोटा और ऊषा मंगेशकर गा चुकी हैं. ये लगातार भजन और निर्गुण लिख रहे हैं. हरिश्चंद्र दास की अब तक भजनों की 16 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. हरिश्चचंद्र बताते हैं कि आचार्य की प्रेरणा से ही भजन लिखता हूं. वे आज नहीं है, लेकिन उनका आशीर्वाद हमेशा साथ रहता है. उनके नाम से मंदिर बनाया है. रोज अपने गुरु की पूजा करता हूं. आचार्य की यहां आदमकद प्रतिमा लगाऊंगा. गुरु के लिए जो भी करूंगा, वह कम ही होगा.

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