सच्चिदा बाबू की बातें जितनी सहज, जीवन भी उतना ही सरल

Updated at : 31 Aug 2018 5:19 AM (IST)
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सच्चिदा बाबू की बातें जितनी सहज, जीवन भी उतना ही सरल

मुजफ्फरपुर : समाजवादी चिंतक सच्चिदानंद सिन्हा की 90वीं वर्षगांठ पर गांधी शांति प्रतिष्ठान की ओर से गुरुवार को विशेष परिचर्चा का आयोजन बीआरए बिहार विश्वविद्यालय के एकेडमिक स्टाफ कॉलेज सभागार में किया गया. चर्चा का विषय था-सच्चिदानंद सिन्हा: कर्म और चिंतन के सहयात्री. वक्ताओं ने सच्चिदा बाबू के कर्म और चिंतन के साथ ही उनकी […]

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मुजफ्फरपुर : समाजवादी चिंतक सच्चिदानंद सिन्हा की 90वीं वर्षगांठ पर गांधी शांति प्रतिष्ठान की ओर से गुरुवार को विशेष परिचर्चा का आयोजन बीआरए बिहार विश्वविद्यालय के एकेडमिक स्टाफ कॉलेज सभागार में किया गया. चर्चा का विषय था-सच्चिदानंद सिन्हा: कर्म और चिंतन के सहयात्री. वक्ताओं ने सच्चिदा बाबू के कर्म और चिंतन के साथ ही उनकी कृतियों का भी उल्लेख किया.

विषयारंभ करते हुए प्रो प्रमोद कुमार ने सच्चिदा बाबू से जुड़े अहम पहलुओं की चर्चा की. कहा कि वे राजनीतिक चेतना वाले एक जमींदार परिवार में जन्म लिया और स्कूली जीवन से ही राजनीतिक यात्रा शुरू कर दी. दुनिया जिस समय द्वितीय विश्व युद्ध लड़ रही थी, उस समय उनकी वैचारिक यात्रा शुरू हुई. बीएससी की पढ़ाई छोड़कर मजदूरों के बीच काम करने बंबई चले गये. कहा कि ‘सोशलिज्म एंड पॉवर’ पुस्तक से इनके वैचारिकी की शुरुआत हुई, जिसमें सत्ता संरचना की गजब व्याख्या है. उन्होंने बताया कि सच्चिदा बाबू की वास्तविक चिंता है कि राज्य व्यवस्था में अंतिम आदमी की क्या जगह है.
प्रो अनिल कुमार ओझा ने कहा कि प्रकृति को इतना नुकसान पहुंचाकर हम न जाएं कि हमारी संतति ही हमें याद न करे. प्रो सरोज कुमार वर्मा ने कहा कि डार्विन के सिद्धांत प्रतियोगिता प्रमुख है, जबकि भारतीय चिंतन में सहयोग की प्रधानता है. अच्युतानंद किशोर नवीन ने कहा कि हमारी पीढ़ी के लिये यह गर्व की बात है, हमें यह कहने का अवसर मिलेगा कि हमने सच्चिदा बाबू को देखा और सुना है.
प्रो अबुजर कमालुद्दीन ने कहा कि सच्चिदा बाबू की तरह जीने वाले लोगों को हमेशा याद किया जाता है. डॉ कृष्ण मोहन ने कहा कि जितनी इनकी बातें सहज है, जीवन भी उतना ही सरल है. अनिल प्रकाश ने कहा कि सच्चिदा बाबू विज्ञान और टेक्नोलॉजी में संतुलन की बात हमेशा करते हैं. उनके चिंतन की मौलिकता व गतिशीलता लेखन में भी दिखता है. नीरज सिंह ने कहा कि उन्होंने मुझे किसानों के बीच काम करना सिखाया. डॉ ब्रजेश कुमार शर्मा ने ग्राम गणराज्य की स्थापना पर सवाल उठाया.
अध्यक्षीय भाषण में बीआरएबीयू के कुलपति डॉ अमरेंद्र नारायण यादव ने कहा कि न्यूनतम से संतुष्टि सच्चिदा बाबू के चिंतन के केंद्र में रहा है. आज समाज में सुख है, लेकिन आनंद नहीं. आनंद के लिये त्याग की भावना होनी चाहिए. सर्वाेदयी चिंतक लक्षणदेव प्रसाद सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि सच्चिदा बाबू ने अपने जीवन और चिंतन से ऐसे आकाश खड़े किये हैं, जहां से समाजवाद को नई दिशा मिलती है. परिचर्चा का संचालन प्रतिष्ठान के सचिव अरविंद वरुण ने किया.
ये भी थे उपस्थित:
प्रो भोजनंदन प्रसाद सिंह, प्रो बीएस झा, अमरनाथ सिंह, कैलाश ठाकुर, विनय प्रशांत, डॉ जयकांत सिंह, रमेश चंद्र, प्रो मंजू सिन्हा, प्रो अवधेश कुमार सिंह, डॉ राकेश कुमार सिंह, डॉ अजीत कुमार गौड़, प्रो विजय कुमार जायसवाल, अनिल शंकर ठाकुर, डॉ अवधेश कुमार, प्रो हरिश्चंद्र सत्यार्थी, डॉ हरेंद्र कुमार, डॉ राजीव कुमार झा, प्रो शैल कुमारी, डॉ आलोक प्रताप सिंह, अजीत कुमार चौधरी, तारकेश्वर मिश्रा, सोनू सरकार, मुकेश ठाकुर, प्रो मनेंद्र कुमार, डॉ हेमनारायण विश्वकर्मा, डॉ अविनाश रंजन, हेमंत कुमार.
विनाश की ओर ले जा रहा विकास का आधुनिक मॉडल: सच्चिदा बाबू
परिचर्चा में विशेष तौर पर आमंत्रित सच्चिदानंद सिंह ने बुनियादी सवालों को सबके सामने रखा. समझाया कि किस तरह विकास का आधुनिक मॉडल विनाश की ओर ले जा रहा है. कहा कि अग्नि आधारित प्रौद्योगिकी अौर विकास का यदि यही मॉडल जारी रहा, तो एक दिन दुनिया को समाप्त होना ही है. विज्ञान और तकनीक की आज की दिशा के विपरीत क्या विज्ञान की ऐसी दिशा हो सकती है, जिसमें प्रकृति का योगदान महत्वपूर्ण हो. कहा कि यह चुनौती आज दुनिया के वैज्ञानिकों और नई पीढ़ी सामने प्रमुख रूप से खड़ी है. उन्होंने कई लोगों के सवालों का जवाब भी दिया. डॉ अरुण कुमार सिंह ने उनसे आज बन रहे गठबंधन पर उनका नजरिया पूछा, तो बोले कि गठबंधन यदि संविधान के ढांचे में बनता है तो ठीक है. सत्तालाभ के लिए गठबंधन गैरवाजिब होता है.
शुरुआत में प्रतिष्ठान के उपाध्यक्ष प्रो विकास नारायण उपाध्याय ने पुष्प गुच्छ प्रदान किया और प्रो अरुण कुमार सिंह ने शॉल भेंट की.
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