मुजफ्फरपुर : ‘लगाके फेयर-लवली, देवघर जइहे जनि रे पगली…’ डीजे की तेज धुन पर यह गाना बज रहा था और पीछे थे नाचते- झूमते युवा. आस्था व उत्साह का यह विकृत नजारा रविवार को अपने शहर में दिखा. बाबा गरीबनाथ का दर्शन करने पहुंच रहे श्रद्धालुओं के कई जत्थों में ऐसे- ऐसे भोजपुरी गीत बज रहे थे, जो हाल के दिनों में हिट हुए भोजपुरी फुहड़ गीतों की धुन पर तैयार किए गए हैं.
शिव और सावन के बीच पिछले कुछ सालों से संगीत ने भी जगह बना ली है. भोजपुरी संगीतप्रेमियों का दायरा बिहार के साथ ही यूपी के पूर्वांचल तक फैला हुआ है. इनके टेस्ट पर ही संगीत बाजार में उतार- चढ़ाव आता है. इन क्षेत्रों में सावन में शिवभक्ति उफान मारती है. यही वजह है कि अधिकतर नवोदित गायकों के अलबम सावन में ही लांच होते हैं. कुछ साल पहले तक गीतों के जरिये शिव को मनाने- रिझाने की कोशिश होती थी, लेकिन अब औघड़दानी का खुलेआम मजाक उड़ा रहे हैं.
भोजपुरी की अपनी अलग पहचान और मिठास है. इसमें फुहड़ता के लिए कोई जगह नहीं है. कुछ लोग ऐसे हैं, जो शार्टकट से लोकप्रियता हासिल करने के लिए परंपरागत गीतों में भी फुहड़ता परोस रहे हैं. वैसे इससे भोजपुरी लोकसंगीत पर कोई असर नहीं पड़ेगा. इस तरह की गीतों से चर्चा जरूर मिल सकती है, लेकिन सफलता नहीं मिलती. यह सब केवल कुछ दिनों के लिए होता है. बादलों की तरह ये हवा के तेज झोंके से किनारे हो जाएंगे.
प्रेम रंजन, लोक कलाकार
बिहार, झारखंड व यूपी के लाखों लोगों की भावनाएं जुड़ी हैं भोजपुरी लोकगीत से. इसमें मिठास व अपनापन है. उल-जुलूल गीतों से भोजपुरी की समृद्ध परंपरा पर कोई असर पड़ने वाला नहीं. भोजपुरी संगीत में रोज नये कलाकार आ रहे हैं. यह अच्छी बात है. इसमें कुछ लोक परंपराओं की बुनियाद मजबूत कर रहे हैं, तो कई ऐसे भी है जो बिना मेहनत के स्टॉर बनना चाहते हैं. यदि हम उन्हें नजरअंदाज कर देंगे, तो आगे से वे इस तरह की गलती नहीं दुहरा सकेंगे.
गोपाल राय, भोजपुरी गायक व अभिनेता
