सबको एक साथ लेकर चलने में ही समाज की सार्थकता : आचार्य कल्याणमित्रानंद

Updated at : 12 May 2025 8:23 PM (IST)
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सबको एक साथ लेकर चलने में ही समाज की सार्थकता : आचार्य कल्याणमित्रानंद

सबको एक साथ लेकर चलने में ही समाज की सार्थकता है. हर एक मनुष्य को शारीरिक मानसिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्र में विकसित होने का अधिकार है.

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जमालपुर. सबको एक साथ लेकर चलने में ही समाज की सार्थकता है. हर एक मनुष्य को शारीरिक मानसिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्र में विकसित होने का अधिकार है, अगर व्यक्ति का लक्ष्य समान है तो उनके बीच एकता लाना संभव है. आध्यात्मिक भाव धार का सृजन कर विश्व बंधुत्व के आधार पर एक मानव समाज की स्थापना को वास्तविक रूप दिया जाना संभव है. आनंद मार्ग के प्रवर्तक श्री आनंदमूर्ति के जन्मोत्सव के मौके पर सोमवार को यह बातें आचार्य कल्याणमित्रानंद अवधूत ने कही. उन्होंने कहा कि बाबा आनंदमूर्ति ने कहा है कि अगर व्यक्ति का लक्ष्य समान है तो उनके बीच एकता लाना संभव है. बाबा ने नव्यमानवता के सिद्धांत का भी प्रतिपादन किया है. जिसमें उन्होंने देखा कि मानव भिन्न-भिन्न प्रकार के कुंठाओं से ग्रसित है. जिस कारण वह अपना तथा जगत के भिन्न जीवन के बीच सही संबंध को समझ पाने में सफल नहीं हो रहा है. इस तरह की कुंठा मानव समाज को भिन्न-भिन्न प्रकार से परस्पर विरोधी गुटों में विभाजित कर रही है. विरोध के कारण समाज को काफी नुकसान हो रहा है. यद्यपि एक और बिरहा मानव धारा है. जिसे मानवता बात कहते हैं, लेकिन मानवता नाम पर जो कुछ हो रहा है. वहां भी भूभाव एवं जाति मजहब भाव ही छुपे रूप में प्रबल है. मानवता की इसी कमी को दूर करने के उद्देश्य से बाबा ने समाज संबंधी वर्तमान धारणा को बेहद कर पशु, पक्षी, पेड़, पौधे को भी भाई-बहन के रूप में देखा. जिसे नव्यमानवता बाद कहते हैं. इसके अतिरिक्त बाबा ने अपने आर्थिक एवं सामाजिक सिद्धांतों का प्रतिपादन करते समय मानव जाति की उन तमाम आवश्यकताओं पर जोर दिया. जिस पर मनुष्य का अस्तित्व एवं मूल्य दोनों निर्भर करता है. साथ ही उसके मनोवैज्ञानिक पक्ष पर भी विचार किया. उनका सामाजिक लाभ जनजन तक पहुंचाना चाहते हैं. प्रगतिशील उपयोग तत्व (प्रउत) आर्थिक संचालन का विकेंद्रीकरण चाहता है. कारण आम जनता को आर्थिक लाभ तभी मिल सकता है, जब हर स्तर पर उसकी भागीदारी हो जनता की आर्थिक प्रक्रिया में भागीदारी के लिए कोऑपरेटिव उपयुक्त है. इसलिए प्रगतिशील उपयोग तत्व में सहकारिता को अहमियत दिया गया है. उन्होंने बताया कि बाबा आनंदमूर्ति ने जितनी भी प्रचलित चिकित्सा प्रणाली है. उनमें कुछ खासियत है, खास बीमारी का इलाज खसखस पद्धति में है एवं रोग के अनुरूप उसका इलाज उपयुक्त प्रणाली से होता है. इस दिशा में उन्होंने योग चिकित्सा एवं द्रव्य गुण नामक पुस्तक लिखकर बहुत से आशाध्याय रोगों के इलाज के लिए नुस्खा दिया.

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