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आध्यात्मिक चेतना व भूमा चैतन्य का भाव जागृत करना मानव का धर्म : पुरोधा प्रमुख

Updated at : 27 Oct 2024 10:13 PM (IST)
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आध्यात्मिक चेतना व भूमा चैतन्य का भाव जागृत करना मानव का धर्म : पुरोधा प्रमुख

आनंद मार्ग प्रचारक संघ का आनंद संभूति मास्टर यूनिट कोलकाली अमझर में चल रहा विश्वस्तरीय धर्म महासम्मेलन का तीसरे दिन रविवार को गुरुसाकाश पांचजन्य के साथ आरंभ हुआ.

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जमालपुर. आनंद मार्ग प्रचारक संघ का आनंद संभूति मास्टर यूनिट कोलकाली अमझर में चल रहा विश्वस्तरीय धर्म महासम्मेलन का तीसरे दिन रविवार को गुरुसाकाश पांचजन्य के साथ आरंभ हुआ. इसका समापन दूसरे सत्र के साथ देर रात्रि हुआ. रविवार को कलेक्टिव साधना के बाद जनरल सेक्रेटरी की अध्यक्षता में केंद्रीय कर्मी के साथ आवश्यक बैठक की गयी. बिगड़े मौसम के बावजूद पुरोधा प्रमुख विश्वदेवानंद अवधूत का आध्यात्मिक प्रवचन भी हुआ. पुरोधा प्रमुख ने कहा कि प्रत्येक सत्ता में जीव और शिव दोनों ही है. वह हमें दृष्टिगोचर नहीं होते. इसलिए नव्य मानवता वाद के अनुसार सभी चेतन है. यह चैतन्य या शिव भाव जितना अधिक है, वहां अभिव्यक्ति भी उतना ही अधिक है. जो उन्नत जीव है, उनमें शिव भाव की अभिव्यक्ति वैसे ही है चैतन्य या शिव भाव अन्य जीवों से ज्यादा मनुष्य में है. इस चेतनता के कारण ही मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ माना गया है. अन्य जीवों के वनस्पति मनुष्य में चैतन्य ज्यादा है. जो परम पुरुष के बराबर नहीं. यह अणु मात्र है. इसलिए जीव को अणु चैतन्य और शिव को भूमा चैतन्य कहते हैं. मनुष्य में अन्य चेतनाएं भी है. भौतिक जगत की चेतना बौद्धिक और मानसिक जगत की चेतना. आध्यात्मिक चेतना बहुत कम लोगों में है. भारत में तो कुछ लोगों में है परंतु विश्व के अन्य देशों में यह नगण्य है. उन्होंने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण है भूमा चेतना का भाव. यह अगर आ गया तो सब कुछ आ गया. जो साधना करते हैं, जो प्रयासरत रहते हैं, उन्हें ही साधक कहते हैं. साधक भूमा चेतना के भाव की ओर कैसे बढ़े, इसके लिए साधना करते हैं. मनुष्य आध्यात्मिक चेतना और भूमा चैतन्य का भाव जागृत करने के लिए ही इस संसार में जन्म लिया है. जिसमें शिव भाव जितना अधिक जागृत होगा. उतना ही अष्ट पास और षढरिपु का बंधन से मुक्त होता चला जायेगा. जिसमें जितना अधिक शिव भाव होगा समाज में प्रतिष्ठा भी उतनी ही वृद्धि होती चली जायेगी. साधना से शिवभाव में उत्तरोत्तर वृद्धि होती है. जो सम समाज तत्व के पथिक हैं उनमें शिव भाव बहुत अधिक है. जो सम समाज तत्व को बहुत अधिक मानकर चलते हैं. उनका खूब विकास होता है. जो सबके कल्याण में ही अपना कल्याण सोचते हैं, वही श्रेष्ठ साधक है. जो आत्मसुख तत्व के राही हैं, वे लक्ष्य से पहले ही रुक जाते हैं. उनका विकास रुक जाता है. उनका आचरण बिगड़ जाता है. उनके जीवन की शांति नष्ट हो जाती है. गोविंद और गुरु दोनों ही गोविंद है. इसलिए गुरु कृपा ही केवलम, ब्रह्म कृपा ही केवलम.

72 घंटे तक चलता रहा बाबा नाम केवलम कीर्तन का हुआ समापन

जमालपुर.

अमझर कोल काली आनंद संभूति मास्टर यूनिट में चल रहे आनंद मार्ग के तीन दिवसीय विश्व स्तरीय धर्म महासम्मेलन के उपलक्ष में 72 घंटे का बाबा नाम केवलम अखंड कीर्तन का रविवार को समापन हो गया. अंतिम दिन के प्रथम सत्र की समाप्ति के बाद कीर्तन करने के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचे. आचार्य मंत्रजापानंद अवधूत ने कहा कि प्रभु के दो पक्ष हैं. एक निर्गुण और दूसरा शगुन भक्तों ने भगवान का नामकरण किया. इसके बाद भगवान नामी कहलाए, क्योंकि उनका नाम दिया गया, जब हम किसी को उसका नाम लेकर बुलाते हैं तो भीड़ में भी वही उत्तर देता है. उन्होंने कहा कि भगवान भक्त को महान कहते हैं भक्त और भगवान के बीच यह लड़ाई चली आ रही है. जब भक्त भगवान की महिमा का गुणगान करते हैं तो इसे कीर्तन कहते हैं. बाबा नाम हरि नाम है, जो इसका जाप करता है. वही सबसे ज्यादा बुद्धिमान है.

संन्यासियों व मार्गियों की बैठक में लिये गये कई निर्णय

जमालपुर. आनंद मार्ग प्रचारक संघ के महासचिव आचार्य अभीरामानंद अवधूत की अध्यक्षता में भुक्ति प्रधान, उप भुक्ति प्रमुख, एलएफटी, सात्विक आचार्य आचार्या एवं आनंदमार्गियों की बैठक आनंद संभूति मास्टर यूनिट के पंडाल में की गयी. आचार्य सत्याश्रयानंद अवधूत ने कहा कि इस प्रजातांत्रिक व्यवस्था में शोषण मुक्त समाज बनाने के लिए नैतिकता शिक्षा और सामाजिक आर्थिक राजनीतिक चेतना पैदा करना आवश्यक है. इसके लिए ग्राम स्तर तक प्रोटेस्ट यूनिवर्सल के छात्रों और युवकों की इकाई तैयार करनी होगी. आचार्य विमलानंद अवधूत ने कहा कि आनंद मार्ग का साहित्य व्यंजन तक पहुंचाने का संकल्प लिया जाए. 2 महीने के अंदर 10 लाख लोगों तक आनंद मार्ग के साहित्य पहुंचने का लोगों ने संकल्प लिया. प्रद्युम्न प्रसाद ने कहा कि नए विश्व का सृजन आनंद मार्गियों का परम कर्तव्य है. इसके लिए सबों को तन मन धन से आगे आना होगा. आचार्य मधुवृत्तानंद अवधूत ने कहा कि भागवत धर्म यूनिवर्सिटी की स्थापना इस आनंद संभूति में की जाएगी. अवधूतिका आनंद दानव्रता आचार्या ने महिला कल्याण विभाग की ओर से वक्तव्य देते हुए कहा कि हमारे बाबा हमें किस तरह देखना चाहते हैं और उन्होंने यह महिला विभाग क्यों स्थापित किया है. बाबा चाहते हैं कि हम महिलाओं की गरिमा को बनाए रखें और उसे ऊंचा उठाएं बाबा महिलाओं की गरिमा को समाज की गरिमा मानते हैं. अगर आध्यात्मिक प्रोग्राम है तो उसे वक्त हमें किस तरह के कपड़े होने चाहिए. आचार्य संपूर्णानंद अवधूत ने कहा कि परिवेश संवर्धन कानन आनंद संभूति में बनाया जायेगा. आचार्य मंत्र जापानंद अवधूत ने कहा कि कीर्तन इस विश्व को शांतिमय आश्रय प्रदान करता है, इसलिए हरी परी मंडल गोष्ठी का गठन किया जाए. आचार्य सिद्धेश्वर आनंद अवधूत ने कहा कि इस विश्व को भक्तिमय वातावरण बनाने के लिए त्याग पूर्ण कार्यकर्ता की जरूरत है. मौके पर आचार्य विश्वस्वरूपानंद अवधूत, आचार्य मंत्रचैतन्यानंद अवधूत, आचार्य धीरजानंद अवधूत, आचार्य पुष्पेंद्रानंद अवधूत, आचार्य रामेंदानंद अवधूत, आचार्य सवितानंद अवधूत आदि मौजूद थे.

आचार्य चित्तस्वरूपानंद अवधूत ने भौतिक शरीर त्यागा

जमालपुर. आनंद मार्ग प्रचारक संघ के पूर्व दसवें महासचिव आचार्य चित्तस्वरूपानंद अवधूत भौतिक शरीर त्याग कर परम पद में लीन हो गये. चेन्नई में 27 अक्तूबर की सुबह 1 बजे हृदय गति रुक जाने के कारण उनका निधन हो गया. वह कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे. आनंद मार्ग के दर्शन से प्रभावित होकर उन्होंने 1965 में आचार्य रूद्रानंद अवधूत से आनंद मार्ग की दीक्षा ली. आचार्य चित्तस्वरूपानंद अवधूत 1967 में कार्यकर्ता बने पहले कोयंबटूर में डीएस के रूप में सेवा की और बाद में हांगकांग क्षेत्र में उन्होंने मेक्सिको में महत्वपूर्ण योगदान दिया. उन्होंने मास्टर यूनिट सचिव और सिओएस के पद पर कार्य किया.

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