Motihari News: गन्ने की फसल पर मंडराया संकट, सरकारी कोटे की सीमित खाद और कड़े नियमों से हरसिद्धि के किसान परेशान
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Motihari News: हरसिद्धि में खाद वितरण की नई सरकारी व्यवस्था से किसान बेहाल हैं. कृषि सलाहकार की हरी झंडी के बिना यूरिया और डीएपी नहीं मिल रही है, जिससे फसलों पर बड़ा संकट मंडराने लगा है.
मोतिहारी से ब्रजकिशोर कुशवाहा की रिपोर्ट
Motihari News: खरीफ और गन्ने की बुवाई के इस अहम सीजन में हरसिद्धि के खेतों से लेकर खाद दुकानों तक सिर्फ मायूसी और आक्रोश का माहौल है. बिहार सरकार की एक नई प्रशासनिक व्यवस्था ने अन्नदाताओं के सामने ऐसी कागजी दीवार खड़ी कर दी है कि अब उन्हें अपने ही हक की खाद के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं. कृषि सलाहकार की लिखित अनुशंसा को अनिवार्य बनाने वाले इस फैसले ने खेतों में पहुंचने वाली खाद की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है.
समय पर यूरिया और डीएपी न मिलने से अब किसानों को अपनी मेहनत और फसल के बर्बाद होने का डर सताने लगा है.
कोटे का कड़ा गणित: सिर्फ एक और दो बोरी का सख्त नियम
सरकार की इस नई डिजिटल और जमीनी गाइडलाइन के तहत अब खाद का वितरण पूरी तरह से किसान आईडी और भूमि रिकॉर्ड के अनुपात से जोड़ दिया गया है. इस व्यवस्था को लागू करने की जिम्मेदारी जिन कंधों पर है, उनका भी कहना है कि वे सिर्फ आदेशों का पालन कर रहे हैं.
इस नई राशनिंग व्यवस्था के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
- भूमि के हिसाब से तय कोटा: किसान ने जितनी जमीन के आधार पर अपनी किसान आईडी बनवाई है, उसी अनुपात में उसे खाद की पर्ची दी जा रही है.
- सीमित मात्रा का नियम: कृषि सलाहकार साबिर आलम के मुताबिक, बड़े किसानों को अधिकतम दो बोरी और छोटे किसानों को महज एक बोरी खाद देने का ही प्रावधान तय किया गया है.
- दुकानदारों पर कार्रवाई का डर: बिना कृषि सलाहकार के हस्ताक्षर और अनुमति पत्र के, कोई भी खाद विक्रेता यूरिया या डीएपी देने को तैयार नहीं है. दुकानदारों का साफ कहना है कि नियमों की अनदेखी करने पर उनके लाइसेंस रद्द हो सकते हैं.
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जरूरत और सरकारी आपूर्ति के बीच गहराया फासला, कराह उठे किसान
इस कड़े नियम ने जमीनी हकीकत और फसलों की वास्तविक खुराक को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया है. गन्ना जैसी नकदी फसलों को शुरुआती दौर में भारी मात्रा में पोषण की आवश्यकता होती है, लेकिन सरकारी दफ्तर के चक्कर काटते-काटते खाद का सही समय निकलता जा रहा है.
| किसान का नाम | खेती की वास्तविक जरूरत | सरकारी कोटे से मिल रही आपूर्ति | मुख्य चिंता और डर |
|---|---|---|---|
| मुकेश कुमार | 8 से 10 बोरी यूरिया | मात्र 2 बोरी प्रति माह | समय पर खाद न मिलने से पौधों की ग्रोथ रुक जाएगी. |
| अवधेश प्रसाद | गन्ने के लिए अधिक डीएपी | नियमों के तहत सीमित कोटा | फसल का उत्पादन घटने से भारी आर्थिक नुकसान होगा. |
| बबलू कुमार | संतुलित पोटाश व यूरिया | कृषि सलाहकार की अनुमति पर निर्भर | नई सरकार से बेहतर उम्मीद थी, लेकिन मुश्किलें बढ़ गईं. |
| मनोज प्रसाद | नकदी फसल के लिए पर्याप्त खाद | केवल निर्धारित सरकारी राशन | जमीनी स्तर पर सिस्टम की उदासीनता से खेती प्रभावित. |
लापरवाही पड़ी भारी तो उत्पादन में आएगी भारी गिरावट
हरसिद्धि के किसानों का कहना है कि सरकारें कागजों पर तो किसान हित की बड़ी-बड़ी बातें करती हैं, लेकिन जब खेतों में पसीना बहाने की बारी आती है तो ऐसे अव्यावहारिक नियम थोप दिए जाते हैं. गन्ने की फसल में अगर इस समय यूरिया और डीएपी की कमी रही, तो पौधों का विकास पूरी तरह ठप हो जाएगा.
परेशान और आक्रोशित किसानों ने अब सीधे राज्य सरकार से गुहार लगाई है कि प्रति एकड़ के इस कागजी कोटे को तुरंत बदला जाए. किसानों की मांग है कि खेती की वास्तविक और व्यावहारिक जरूरत को बेंचमार्क मानकर तुरंत पर्याप्त खाद की व्यवस्था की जाए, ताकि इस साल होने वाले बड़े आर्थिक नुकसान से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बचाया जा सके.
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