Madhubani : जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण दिवस के रूप में मनाया गया बुद्ध पूर्णिमा

Edited by DIGVIJAY SINGH
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भारतीय संस्कृति और धर्म में बुद्ध पूर्णिमा पर्व का खास महत्व है.

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Madhubani : मधुबनी . भारतीय संस्कृति और धर्म में बुद्ध पूर्णिमा पर्व का खास महत्व है. यह पर्व जिले में सोमवार को भगवान बुद्ध के जन्म, ज्ञान प्राप्ति (बोधि) और महापरिनिर्वाण तीनों घटनाओं का स्मरण दिवस के रूप में मनाया गया. बौद्ध धर्म के अनुयायियों ने आश्रम में पहुंचकर महापरिनिर्वाण का स्मरण कर साधना की. वैशाख माह की पूर्णिमा को यह त्रिवेणी तिथि होने के कारण यह दिन बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए सबसे पवित्र माना जाता है. विदित हो कि आज के दिन ही भगवान बुद्ध ने संसार को दुखों से मुक्ति का मार्ग दिखाया था. वैशाख मास की पूर्णिमा को यह त्रिवेणी तिथि होने के कारण यह दिन बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए सबसे पवित्र दिन है.बुद्ध पूर्णिमा हिंदू और बौद्ध धर्म के लिए है खास बुद्ध पूर्णिमा का पर्व हिंदू और बौद्ध धर्म दोनों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है. मान्यता है कि इस दिन भगवान बुद्ध के रूप में भगवान विष्णु के नौवें अवतार हुआ था. हिंदू पंचांग के अनुसार यह पर्व हर साल वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है. इस दिन भगवान बुद्ध का सिर्फ जन्म ही नहीं बल्कि इसी तिथि को वर्षों वन में भटकने व कठोर तपस्या करने के पश्चात बोध गया में बोध वृक्ष के नीचे बुद्ध को सत्य का ज्ञान प्राप्त हुआ. वहीं इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने के साथ पीपल के पेड़ की पूजा करने से शुभ फलों की भी प्राप्ति होती है. आश्रम में लोगों ने किया शांति पाठ बुद्ध पूर्णिमा के दिन हिंदू एवं बौद्ध धर्म के लोग पारंपरिक रूप से बोधिवृक्ष (पीपल के पेड़) की पूजा की. श्रद्धालु आश्रम में भगवान बुद्ध की प्रतिमा को गंगाजल से स्नान कराकर धूप, दीप, पुष्प, चंदन और फल अर्पित किए. इसके साथ ही शांति पाठ और त्रिशरण पंचशील का उच्चारण किया. पीपल वृक्ष की गई पूजा श्रद्धालु बुद्ध पूर्णिमा के दिन पीपल के पेड़ की पूजा की. कारण पीपल का वृक्ष भगवान विष्णु से जुड़ा हुआ है और इसे एक पवित्र वृक्ष माना जाता है. कहते हैं इस वृक्ष की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि का वास होता है. पीपल के पेड़ के नीचे दीपक और धूप जलाएं. फिर ताजे फूल चढ़ाएं, खासकर सफेद और पीले रंग के फूल चढ़ाएं. पीपल के पेड़ की पूजा करते हुए भगवान बुद्ध की पूजा की. साथ ही दूध, शहद, घी और पानी का मिश्रण चढ़ाया.

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