खादी ग्रामोद्योग : अब यादें ही धरोहर!
अपनों ने ही लूटा इस पवित्र संस्था को मधुबनी : राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अंगरेजी हुकूमत के खिलाफ बिगुल फूंकते हुए अपने हाथों से सूत काटकर कपड़ा तैयार करने की पहल शुरू की थी. परिकल्पना यह थी कि लोग आत्मनिर्भर बनें व देश का धन देश में ही रहे, युवाओं व हर नागरिक को इसके […]
अपनों ने ही लूटा इस पवित्र संस्था को
मधुबनी : राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अंगरेजी हुकूमत के खिलाफ बिगुल फूंकते हुए अपने हाथों से सूत काटकर कपड़ा तैयार करने की पहल शुरू की थी. परिकल्पना यह थी कि लोग आत्मनिर्भर बनें व देश का धन देश में ही रहे, युवाओं व हर नागरिक को इसके तहत रोजगार के अवसर मिले.
यह परिकल्पना साकार भी हुआ, लेकिन अब तो स्थिति ऐसी बन गयी है कि स्मृति ही उन परिकल्पना की धरोहर रह गयी है. कुछ सरकार की उदासीनता, कुछ संस्था में वर्चस्व की लड़ाई तो कुछ आम लोगाें की लापरवाही ने खादी ग्रामोद्योग संस्था को धीरे धीरे मिट्टी में मिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.
अब यादें ही शेष
बिहार राज्य खादी ग्रामोद्योग संघ की स्थापना 1925 में मुजफ्फरपुर में हुई थी. इसके बाद क्रमश: 1972, 1973 एवं 1974 ई. में जिले में भी इसके शाखा की स्थापना की गयी. मधुबनी जिले में खादी ग्रामोद्योग संस्था की स्थापना 1973 ई में की गयी. सस्था से सेवानिवृत हो चुके अवध नारायण झा बताते हैं कि 90 के दशक में इस संस्था में करीब 15 हजार कत्तिन, बुनकर व कर्मी काम करते थे. चौबीसों घंटे चरखे की आवाज गूंजा करती थी, लेकिन अब तो सिर्फ उन दिनों को याद कर ही संतोष किया जा सकता है. इन दिनों मात्र 200 कत्तिन, बुनकर एवं कर्मी ही इस संस्था से जुड़े रह गये हैं.
26 केंद्र हो चुके हैं बंद
जिले के मुख्य केंद्र के अलावे विभिन्न भागों में कुल 42 केंद्र खोले गये, लेकिन अब इनमें से 26 केंद्र पूरी तरह बंद हो चुके हैं. कहने भर को ही बाकी के 16 केंद्र खुले हैं. इसमें काम करने वाले बुनकर, कत्तिन व कर्मी को कई माह का वेतन भी नहीं मिला है. फटेहाली में कर्मी का जीवन गुजर रहा है.
परिसंपत्ति पर कब्जा
लचर व्यवस्था ने न सिर्फ इस उद्योग पर वज्रपात किया बल्कि इसके परिसंपत्ति पर भी कहर ढाया है. जानकारी के अनुसार जिला मुख्यालय सहित विभिन्न क्षेत्रों में खादी ग्रामोद्योग संघ की 80 एकड़ जमीन थी. इसमें से कई एकड़ जमीन पर लोगों ने कब्जा कर लिया है. इसक साथ ही जमीन व मकान पर चल रहे कार्यालय का भाड़ा मासिक करीब एक लाख रुपये आना चाहिए, लेकिन मिल रहा है मात्र 25 हजार रुपये.
बरबाद हो गया सामान
खादी ग्रामोद्योग संघ पर समय ने किस प्रकार अपनी अपना खेल खेलते हुए इसे गर्त में डाल दिया है यदि यह देखना हो तो कोई मुख्यालय स्थित खादी ग्रामोद्योग संघ के परिसर में आये.
खंडहर ही बता देगी कि इस इमारत की बुलंदी क्या रही होगी. बंद पड़े मशीन, चरखा, जर्जर दीवार, परिसर में लगे जंगल देख कर स्वत: ही इस परिसर में आने वाले के मुंह से आह निकल जाती है. हर किसी की अंतर आत्मा कराह उठती है. जिस चरखा की आवाज से कभी यह परिसर गुंजायमान रहता था. आज वह चरखा टूट कर बिखड़ा हुआ है. करीब 1.5 करोड़ की लागत वाली कपड़ा रंगने की मशीन नहीं चलने के कारण बरबाद हो गया है.
यह मशीन 1996 में बंद हो गया. हजारों लोग जिस परिसर में रहते थे, आज उसमें जंगल व जलजमाव इस कदर है कि लोगों को परिसर में जाने में भी डर लगता है. खादी ग्रामोद्योग का बरबादी का रास्ता 2000 ई के बाद तैयार किया गया. 1990 से 2000 तक खादी ग्रामोद्योग संघ में न सिर्फ कपड़े बनुने का काम होता था बल्कि अन्य कई काम भी किया जाता था. विद्यालय था, तेल पेराई का काम भी होता था. लकड़ी का फर्नीचर भी बनाया जाता था, लेकिन अब इनमें से कुछ भी नहीं होता़
आपसी वर्चस्व की रही लड़ाई
खादी ग्रामोद्योग संघ को उसके अपनों ने सबसे अधिक बरबाद किया है. आपसी वर्चस्व की लड़ाई और राजनीति इस कदर चली कि एकता टूटती गया. काम से अधिक लोग राजनीति में दिलचस्पी लेने लगे. स्वभाविक तौर पर काम से लोग पीछे हटते गये, अपनी जिम्मेदारी भुलते गये. परिणाम आज सबके सामने है.
क्या कहते हैं अध्यक्ष
खादी ग्रामोद्योग संघ जिला के अध्यक्ष सरला देवी ने बताया है कि सरकार की लापरवाही व संस्था से जुड़े कुछ लोगों की निष्क्रियता के कारण यह पवित्र संस्था आज बदहाली के दौर से गुजर रहा है. इसमें संसाधन की घोर कमी है. हालांकि इस साल 25 चरखा चलाने की पहल की जायेगी, ताकि कत्तिन व बुनकर को कुछ राहत मिल सके.
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