रोज शहर आते काम की तलाश में, खाली हाथ लौट जाते

Published at :25 Nov 2017 6:05 AM (IST)
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रोज शहर आते काम की तलाश में, खाली हाथ लौट जाते

मधुबनी : सुबह के करीब आठ बज रहे थे. हम टहलते हुए तेरह नंबर गुमटी के पास पहुंचे. इस समय ग्रामीण क्षेत्रों के किसान हरी ताजी सब्जी लेकर इसी होकर निकलते हैं. सोचा था ताजी सब्जी खरीदेंगे. पर हम जैसे ही हम गुमटी के करीब पहुंचे, अचानक ही वहां के करीब दस लोग हमारे पास […]

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मधुबनी : सुबह के करीब आठ बज रहे थे. हम टहलते हुए तेरह नंबर गुमटी के पास पहुंचे. इस समय ग्रामीण क्षेत्रों के किसान हरी ताजी सब्जी लेकर इसी होकर निकलते हैं. सोचा था ताजी सब्जी खरीदेंगे. पर हम जैसे ही हम गुमटी के करीब पहुंचे, अचानक ही वहां के करीब दस लोग हमारे पास आ गये. सब मजदूर व राज मिस्त्री थे.

किसी के हाथ में कुदाल तो किसी के हाथ में करनी – बसुली (जोड़ाई करने वाला सामान ) था. हमे देखते ही वह सभी अचानक ही कहने लगा ”मालिक की काज छी, घर जोड़ाई करेबा के छी,आ की आउर कुनो काज चलू ने हम सब क दई छी. अहां हमरा सब से मात्र तीन सौ रुपैया की दर स मजदूरी द देब. राज मिस्त्री के चाइर सौ. हर सब घड़ी देख का पूरा पूरा आठ घंटा काज क देब. ” हम अचंभित. यही वह जगह है जहां पर हम कुछ दिन पूर्व अपने घर में कुछ काम से राज मिस्त्री और मजदूर को खोजने आये थे तो सभी मुंह घुमा कर निकल गये थे. एक दूसरे पर काम को थोंप कर फेंक रहा था. जैसे कोई बगैर मजदूरी के उन्हें काम को बोला हो.

मजदूर पांच सौ रुपये मांग रहा था तो राज 700 से आठ सौ तक. पर आज तो माहौल ठीक उल्टा था. जानकारी के अनुसार हर दिन यहां जिले भर के करीब दो सौ से अधिक मजदूर व राज मिस्त्री काम के तलाश में आते हैं. जिन्हें लोग काम मुहैया कराते हैं.

हममें भी अचानक हुए इस बदलाव के बारे में जानकारी लेने की उत्सुकता हुई. हमने एक मजदूर से पूछा क्या बात है आज यहां पर अब तक आप लोग खड़े हैं. तो जो बातें मजदूरों ने बतायी वह चौंकाने वाली थी. मजदूरों ने बताया कि कुछ दिनों से उन्हें काम नहीं मिल रहा. दूर दूर से काम की तलाश में शहर आ रहे हैं. दिन भर काम ढूंढते हैं.
पर काम नहीं मिल पाने के कारण शाम में वापस गांव लौट जाते हैं. कलुआही प्रखंड के हरिपुर गौड़ी दास टोल निवासी वरुण कुमार बताता है कि बीते छह दिन से वह हर दिन इस उम्मीद से घर से मधुबनी आता है कि आज कुछ मजदूरी मिल जायेगी. पर लोग तो काम ही नहीं करा रहे. जो कुछ पहले का बचा खुचा है वही घर में बन रहा है. किसी तरह परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं.
सहुआ टोल निवासी प्रमोद कुमार बताता है कि पहले तो कुछ काम मिल भी जाता था. पर जबसे बालू आना बंद हुआ उस दिन से कुछ काम नहीं मिल रहा. कोई खोजने तक नहीं आता है. परिवार का गुजर कर्ज लेकर चल रहा है.
गौरक्षणी का भरथ लाल यादव पेशे से राज मिस्त्री है. कुछ दिन पूर्व तक लोग काम के लिये इनके घर पर चक्कर काटा करते थे. पर समय बदला, बालू सीमेंट का कारोबार थम गया. इसने भरथ लाल यादव को आज काम के तलाश में शहर में आकर खड़ा होने को मजबूर कर दिया है. भरथ लाल यादव बताता है कि काम के तलाश में करीब दस दिन से आ रहे हैं.
काम नहीं मिल रहा. जो कुछ कमा कर रखा है उससे परिवार चल रहा है. इसी प्रकार भरथ राम चकदह से काम के तलाश में आये थे. बताते हैं कि काम की परेशानी नोटबंदी व जीएसटी के बाद से ही है. पर बालू पर रोक के बाद तो हालात बदतर हो गया है. जहां पर काम मिला था. वहां से भी काम बंद हो गया है. सामान ही उपलब्ध नहीं है.
दरअसल कुछ दिन पूर्व से बालू पर रोक एवं खनन नीति के विरोध में भवन निर्माण सामग्री विक्रेताओं की हड़ताल पर जाने के कारण तो काम काज पूरी तरह प्रभावित हो गया है. सबसे बुरा असर तो घर निर्माण से जुड़े राज मिस्त्री व मजदूरों पर हुआ है. कहीं भी काम नहीं मिल रहा. यदि कहीं काम मिल भी रहा है तो एक दो दिन का. चोरी छिपे कहीं से बालू आ जाता है तो कहीं कहीं काम होता है नहीं तो काम ही नहीं हो रहा. हालांकि अब धीरे धीरे दुकान खुलने लगी हैं. जिससे काम काज पटरी लौटने की संभावना है.
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