शिक्षा की कुंजी से होगा आधी आबादी का विकास
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :08 Mar 2016 6:55 AM (IST)
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महिला दिवस . जिले की हुनरमंद महिलाओं ने दिया शिक्षा पर बल मधेपुरा : नारी सशक्तीकरण की दिशा में मधेपुरा सदियों से सार्थक प्रयास करता रहा है. इसके कई जीवंत प्रमाण भी मौजूद हैं. नाम गिनने की बात हो, तो सैकड़ों नाम आसानी से लिये जा सकते हैं. आधी आबादी को पूरा सम्मान, शिक्षा और […]
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महिला दिवस . जिले की हुनरमंद महिलाओं ने दिया शिक्षा पर बल
मधेपुरा : नारी सशक्तीकरण की दिशा में मधेपुरा सदियों से सार्थक प्रयास करता रहा है. इसके कई जीवंत प्रमाण भी मौजूद हैं. नाम गिनने की बात हो, तो सैकड़ों नाम आसानी से लिये जा सकते हैं.
आधी आबादी को पूरा सम्मान, शिक्षा और मौलिक अधिकार प्रदान करने में समाजवादियों की इस धरती ने कोई कमी नहीं की है. आजादी के महज कुछ वर्ष बाद ही मधेपुरा की कई बेटियां अपनी प्रतिभा के बल पर राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने में कामयाब रहीं. वर्तमान समय में भी इस धरती की सैकड़ों महिलाएं देश और विदेश में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं. अपनी ही धरती पर अपने हुनर से कुछ खास करके आदर्श बनाने वाली कुछ महिलाओं के संघर्ष के बारे में हम आज बता रहे हैं.
डाॅ शांति यादव ख्याती प्राप्त विदुशी 1976 ई से अप्रैल 2015 तक हाइस्कूल के प्राचार्य पद पर पदस्थापित रही. कई साहित्यिक उपलब्धियां इनकी सात पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है. तीन पुस्तकें शीघ्र प्रकाशय, 1972 ई से राष्ट्रीय स्तर के पत्र पत्रिकाओं में लिखित रही है.
कई स्मारिकाओं एवं स्मृति ग्रंथों का संपादन का कार्य किया. भारत सरकार, बिहार सरकार सहित कई अन्य ख्याति प्राप्त संस्थाओं, संगठनों द्वारा सम्मानित, सामाजिक कार्य के कारण इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी सहित बिहार राज्य भाषा परिषद सहित एक दर्जन सामाजिक संस्थानों में पद पर तैनात हैं. डाॅ शांति यादव कहती हैं सामाजिक विसंगतियों लैंगिक असामनताओं व पुरुष वर्चस्व वाले समाज में महिलाओं को अपने लिए अलग स्थान बना पाना चुनौती से कम नहीं. शिक्षा मात्र को पूंजी मान कर संघर्ष के बदौलत आसानी से आगे बढा जा सकता है. महिलाओं का अपना आत्म विश्वास सबसे बड़ी ताकत है.
आरती कुमारी सहायक अवर निरीक्षक महिला थाना मधेपुरा . सन् 1988 से पुलिस विभाग में कार्यरत, कई उत्कृष्ट कार्य के लिए पुरस्कृत, बाल विवाह के विरूद्ध ग्रामीण और अशिक्षित इलाकों में जागरूकता फैलाती है.
महिलाओं को हर हाल में शिक्षा और हुनर से जुड़ने के लिए प्रेरित करती है.महिला पुलिस अधिकारी आरती कुमारी नारी सशक्तिकरण की एक ऐसी मिशाल है जो बिना किसी सहारे के अपने आत्म विश्वास के बूते खुद खड़ी होकर आज पीड़ित महिलाओं के लिए हरवक्त खड़ी रहती है. जन्म से संघर्ष करने वाली यह अधिकारी पुलिस की ड्यूटी के साथ साथ समाज में व्याप्त बाल विवाह और अधिक बच्चे पैदा करने की कुरीति के खिलाफ लोगों को जागरूक भी कर रही है. आर्थिक रूप से काफी पिछड़े परिवार में जन्म लेकर गांव की स्कूल से पढाई कर अपने धैर्य और लगन के बदौलत पुलिस की नौकरी में आयी इस महिला अधिकारी का बाल विवाह हुआ था. महज 13 साल की उम्र में शादी होने के बावजूद आरती ने अपने जागते आंखों से देखे हुए सपनों को धुधला नहीं होने दिया.
डाॅ चंद्रिका यादव, संचालिका, माया विद्यानिकेतन, मधेपुरा . साहित्य और सामाजिक कार्यों में विशेष अभिरूची एमएससी, एलएलबी, बीटी सहित अन्य उच्च शिक्षा कई राष्ट्रीय संगठनों द्वारा सामाजिक कार्यों के लिए पुरस्कृत कविता के माध्यम से महिला और सामाज के दर्द को उठाने के लिए भी बड़े बड़े मंचों पर पुरस्कृत.
उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बावजूद बचपन से शिक्षक बनने की तमन्ना और अपनी मिटटी का आगाध प्रेम ने कोसी से बाहर निकलने नहीं दिया. शिक्षक के रूप में प्राइवेट स्कूल डॉन बास्को एकेडमी की स्थापना के बाद महिलाओं और बच्चों के जीवन शैली को बदलने के लिए विभिन्न मंच के माध्यम से लगातार जागरूकता फैलाती रही. मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता. हर महिला किसी न किसी हुनर से भरी होती है. अपने हुनर को पहचाने और लक्ष्य की ओर बढें.
डाॅ बंदना कुमारी, प्राचार्या, होली क्रॉस स्कूल मधेपुरा . महज दो साल की उम्र में पिता का साया सर से उठ जाने के बाद प्राइवेट टियूशन पढा कर पीजी तक की शिक्षा हासिल करने वाली हॉली क्रॉस स्कूल की प्राचार्या बंदना कुमारी नारी सशक्तिकरण की एक मिशाल के रूप में स्थापित है.
कई सामाजिक और सरकारी संगठनों द्वारा इनके कार्यों के लिए इन्हें पुरस्कृत भी किया है. महज कुछ ही वर्षों में अपने कार्य के बदौलत ख्याती अर्जित करने वाली इस शिक्षिका को नई पीढी की महिलाएं अपने आदर्श के रूप में स्वीकार करती है.
मधेपुरा में पहला बालिका प्राइवेट स्कूल खोलने का श्रय भी इन्हीं को जाता है. बंदना कुमारी बताती है कि शिक्षा आत्म निर्भरता की नीभ है. खास कर लड़कियों को शिक्षित होना बहुत जरूरी है. यह सोच कर अपने स्कूल में पढने वाले सभी ऐसी लड़कियां जिसके पिता नहीं है और परिवार आर्थिक रूप से कमजोर है ऐसे छात्राओं का आधा फीस माफ करने का निर्णय लिया.
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