साहत्यि सांप्रदायिक सद्भाव को देता है बढावा

Published at :18 Dec 2015 6:35 PM (IST)
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साहत्यि सांप्रदायिक सद्भाव को देता है बढावा

साहित्य सांप्रदायिक सद्भाव को देता है बढावा फोटो – कैंपस – 02 कैप्शन – हिंदी विभाग में संगोष्ठी को संबोधित करते विद्वजन एवं उपस्थित छात्र-छात्राएं – बीएनएमयू के हिंदी विभाग में ‘हिंदी साहित्य में सांप्रदायिक विमर्श’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजनप्रतिनिधि मधेपुरा़ भूपेंद्र नारायण मंडल विवि के हिंदी विभाग में शुक्र वार को ‘हिंदी साहित्य […]

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साहित्य सांप्रदायिक सद्भाव को देता है बढावा फोटो – कैंपस – 02 कैप्शन – हिंदी विभाग में संगोष्ठी को संबोधित करते विद्वजन एवं उपस्थित छात्र-छात्राएं – बीएनएमयू के हिंदी विभाग में ‘हिंदी साहित्य में सांप्रदायिक विमर्श’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजनप्रतिनिधि मधेपुरा़ भूपेंद्र नारायण मंडल विवि के हिंदी विभाग में शुक्र वार को ‘हिंदी साहित्य में सांप्रदायिक विमर्र्श’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया़ संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रो इंद्र नारायण यादव ने की़ विषय प्रवर्तन करते हुए डा सिद्घेश्वर काश्यप ने कहा कि हिंदी साहित्य में धार्मिक संप्रदाय की दीर्घ परंपरा है़ इसमें धर्म जाति से ईश्वर के प्रति आस्था एवं विश्वास व्यक्त है़ यही संप्रदाय बाद में पंथ का रूप धारण कर लेता है़ इसमें व्यक्तिनिष्ठा और विशेष ब्रह्म के निर्गुण सगुण रूप के प्रति आस्था की प्रमुखता होती है़ धर्म जाति पर आधारित राजनीति संप्रदाय को विकृत करती है़ साहित्य में भी धर्म निरपेक्षता एवं सांप्रदायिकता का अंत: संघर्ष प्रारंभ होता है़ प्रेमचंद, यशपाल, भीष्म साहनी, कमलेश्वर, राही मासूम रजा, अब्दुल विस्मिल्लाह, शानी आदि लेखक धार्मिक संकीर्णता और सांप्रदायिकता की विदू्रपता को उजागर करते हैं और सांप्रदायिक सौहार्द की प्रतिष्ठा का उपक्र म हैं़ डा मनोज पराशर ने कहा कि सांप्रदायिकता विभिन्न जातियों, धर्मावलंबियों, मतावलंबियों के हितों की टकराहट है किंतु हिंदी साहित्य धार्मिक सद्भाव का साहित्य है़ डा विनय कुमार चौधरी ने कहा कि हिंदी उपन्यासों और कहानियों में सांप्रदायिक विद्रूपताओं और जड़ताओं पर तीव्र चोट है़ झूठा सच, आधा गांव, तमस और कितने पाकिस्तान, मर गया दीपनाथ आदि कृतियों में सांप्रदायिक सत्य का उद्घाटन है़ टारजेएम कॉलेज सहरसा की प्रधानाचार्य डा रेणु सिंह ने कहा कि संपूर्ण भारतीय व्यवस्था में सह अस्तित्व, साहचर्य, बंधुत्व की प्रेरणा है़ शरणदाता मलवे का मालिक, पंच परमेश्वर सहित कई कहानियां सांप्रदायिक सद्भाव को स्वर देती है़ विभागाध्यक्ष प्रो इंद्र नारायण यादव ने कहा कि साहित्य समाजिक सांस्कृतिक और धार्मिक सद्भाव और जन कल्याण को स्वर देता है़ इस अवसर पर कृष्ण मुरारी, आशीष कुमार, विभीषण, अशोक, विजया लक्ष्मी, मनोज विद्यासागर, ने विचार व्यक्त किये़ इस संगोष्ठी में हिंदी विभाग के सभी विद्यार्थी उपस्थित थे़ राजकिशोर, अकील, संगु, रूपा, अन्नू, राजलक्ष्मी, आदि की महत्वपूर्ण भूमिका रही़

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