तकनीकी विधि से खेती में मुनाफा

Published at :16 Jul 2013 1:37 PM (IST)
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तकनीकी विधि से खेती में मुनाफा

उदाकिशुनगंज : जिले के उदाकिशुनगंज प्रखंड कार्यालय परिसर में मंगलवार को कृषि विभाग द्वारा श्रीविधि महाअभियान 2013 के तहत एक दिवसीय कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया. इस शिविर का उदघाटन प्रखंड विकास पदाधिकारी नेसार अहमद ने किया. किसानों को संबोधित करते हुए बीडीओ श्री अहमद ने कहा कि भारत एक कृषि प्रधान देश […]

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उदाकिशुनगंज : जिले के उदाकिशुनगंज प्रखंड कार्यालय परिसर में मंगलवार को कृषि विभाग द्वारा श्रीविधि महाअभियान 2013 के तहत एक दिवसीय कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया.

इस शिविर का उदघाटन प्रखंड विकास पदाधिकारी नेसार अहमद ने किया. किसानों को संबोधित करते हुए बीडीओ श्री अहमद ने कहा कि भारत एक कृषि प्रधान देश है. खेती पर हमारा देश निर्भर है. आज के परिवेश में किसानो से प्रकृति भी रूठी हुई है. ऐसे में किसानो के समक्ष कई तरह की समस्याएं उत्पन्न हो रही है.

ऐसे हालात में राज्य सरकार ने कृषि को बढ़ावा देने के लिए कई लाभ कारी योजनाओं का क्रियान्वयन कर रखा है. जरूरत है कि किसान जागरूक होकर योजनाओ का लाभ लें. वर्तमान परिवेश में खेती करने के नियम भी बदले नियमो के मुताबिक खेती करने से कम लागत में अधिक मुनाफा होता है. उन्होंने विभाग द्वारा चलाये जा रहे श्रीविधि योजना के तहत खेती करने के लिए किसानो को प्रेरित किये.

मौके पर प्रखंड के प्रभारी कृषि पदाधिकारी उमेश बैठा ने कहा कि कृषि विभाग द्वारा किसान हित में कई योजनाएं चलायी जा रही है. अभी हाल में ही गरमा मूंग फसल के लिए 2500 सौ किसानों के बीच बीज का वितरण किया गया. जो किसान पशु पालते हैं उनके लिए हरा चारा बीज दिया जायेगा.

यह बीज प्रखंड के 1000 किसानो के बीच वितरण होना है. ढैंचा खाद के लिए प्रखंड में 75 क्विंटल बीज उपलब्ध है जो शीघ्र वितरित की जायेगी. श्रीविधि योजना के तहत धान बुआई के लिए प्रखंड में 660 किसानो को लाभ दिये जाने का लक्ष्य रखा गया है. इस हिसाब से प्रत्येक पंचायत में 250 एकड़ में खेती हो सकती है.

कृषि वैज्ञानिक मिथिलेश कुमार क्रांति ने कहा कि किसान प्रशिक्षण प्राप्त कर श्रीविधि योजना को अवश्य अपनाये. इस योजना के अपनाये जाने से कई फायदे हैं. धान खाद्य फसलों में सबसे प्रमुख फसल है. इसकी खेती प्राचीन काल से ही विश्व के अधिकांश देशों में होती है. पूर्व में धान के बुआई के 25-30 दिनों बाद बिचरों का इस्तेमाल में लाया जाता रहा. जबकि श्रीविधि से तकनीकी अपनाये जाने से मात्र 8 से 10 दिनो के बाद ही बिचरों को प्रयोग में लाया जा सकता है.

हालांकि इस विधि से रोपाई करने में कुछ सावधानियां रखना जरूरी है. वजह कि बिचरा कम दिनो के कारण बहुत नाजुक होती है. इस बिचरे को कम गहराई के मिट्टी में रोपाई किया जाना चाहिए. रोपाई की दूरी 25 सेमी रखना जरूरी होता है. कृषि वैज्ञानिक सुनील कुमार सुमन ने कहा कि इस विधि को अपनाये जाने से एक साथ दो फायदे होते है. पहला कि खरपतवार नष्ट होने से फसलो एवं घास के बीच कोई प्रतिस्पद्र्घा नही रहती है. दूसरा मिट्टी हलका रहने से जड़ को हवा भी प्रयाप्त रहता है.

इस विधि के तहत रोपाई एवं खेतो की देख भाल जरूरी है. इस अवसर पर मधेपुरा से पहुंचे वस्तु विशेषज्ञ कुणाल किशोर, उदाकिशुनगंज के वस्तु विशेषज्ञ नरेश प्रसाद, निक्की प्रिया ने भी किसानो के समक्ष खेती करने की जानकारी उपलब्ध करायी.

मौके पर जदयू के प्रखंड अध्यक्ष कमलेश्वरी मेहता, पूर्व सरपंच मृत्युंजय मेहता, किसान सलाहकार, अनिल पाठक परमानंद राय, धमेन्द्र कुमार, सिल्पी कुमारी, बिंदु, मो महताब, आनंद राज, राज किशोर, अमरेन्द्र, तकनीकी सहायक अमर कुमार आदि उपस्थित थे.

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