अगस्त क्रांति के सूत्रधार थे स्वतंत्रता सेनानी राजेश्वर
Author Prabhat khabar digital desk
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मधेपुरा : शरीर नश्वर है, लेकिन अमर आत्मा की जीवंत आवाज पुनः गुंजायमान हुई. मौका था स्वाधीनता संग्राम के अग्रणी नायक, अगस्त क्रांति के सूत्रधार राजेश्वर प्रसाद सिंह की 30 वीं पुण्यतिथि का. धन्य है हमारी मातृभूमि जहां ऐसे वीर योद्धाओं का अवतरण हुआ. वीर गाथाओं का अवलोकन बड़ा ही सुलभ है, लेकिन वीर बांकुड़ो […]
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मधेपुरा : शरीर नश्वर है, लेकिन अमर आत्मा की जीवंत आवाज पुनः गुंजायमान हुई. मौका था स्वाधीनता संग्राम के अग्रणी नायक, अगस्त क्रांति के सूत्रधार राजेश्वर प्रसाद सिंह की 30 वीं पुण्यतिथि का. धन्य है हमारी मातृभूमि जहां ऐसे वीर योद्धाओं का अवतरण हुआ. वीर गाथाओं का अवलोकन बड़ा ही सुलभ है, लेकिन वीर बांकुड़ो का निर्वाण दिवस एक उत्सव के रूप में मनाना निश्चय ही राष्ट्र के युवा पीढ़ी को क्रांतिकारी संदेश देता है.
मंगलवार को जिले के गवलपाड़ा प्रखंड के तरूणेश्वरपूर (झिटकिया) में उनके तैल चित्र पर पुष्प अर्पित कर लोगों ने उनके कृतित्व पर प्रकाश डाला व श्रद्धांजलि अर्पित की. मौके पर योगेंद्र नारायण सिंह ने राजेश्वर बाबू के शौर्यपूर्ण जीवनी का उल्लेख करते हुये कहा कि राजेश्वर बाबू अद्वितीय प्रतिभा संपन्न राष्ट्रभक्त थे.
ब्रिटिश हुकूमत को ललकारते हुए उन्होंने कई ऐसे काम किए जो हमारे देशभक्ति को प्रफुल्लित करती है. आजादी के जंग के दौरान पांच वर्षों तक जेल की यातनाएं सहने के बावजूद वो देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत रहे. स्वाधीनता संग्राम में उनके सक्रिय भागीदारी को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने उनपर कई तरह की कानून की धाराएं लगाकर बेड़ियों में जकड़ कैद कर दिया.
धमदाहा थाना रेड केस में उनपर राजेश्वर प्रसाद सिंह बनाम इंपेरर केस चलाया गया. जिसमें उन्हें छह वर्षों की सजा सुनाई गयी. राजेश्वर बाबू समाजिक सरोकार से जुड़े हुए व्यक्तित्व थे. एक शिक्षाविद के रूप में समाज के हर तबके को शिक्षित करने के लिए तत्पर रहे. हिंदी से बेचलर डिग्री व साहित्य रत्न सीटी प्राप्त कर कई विद्यालयों व विश्वविद्यालयों से संबंधित रहे.
शुरूआती दिनों से ही वे शिक्षा का अलख जगाने के लिए समर्पित रहे. मधेपुरा उच्च विद्यालय, शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालय मधेपुरा के प्राचार्य के रूप में कार्यरत होकर हजारों शिक्षकों को प्रशिक्षण देकर राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरित किये. स्वतंत्रता संग्राम में उल्लेखनीय भूमिका निभाने के लिए आजादी के 25वें वर्ष 1972 में राष्ट्र की ओर से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ताम्रपत्र से सम्मानित किये गये जो इस क्षेत्र के लिए गौरव का विषय है.
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