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मौसम ने बदली करवट, बढ़ी ठंड, रजाई की बढ़ी डिमांड

Updated at : 05 Dec 2024 9:15 PM (IST)
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मौसम ने बदली करवट, बढ़ी ठंड, रजाई की बढ़ी डिमांड

इन दिनों सुबह से मौसम में अचानक बदलाव से लोग घरों के बाहर खुली धूप में सुखाते नजर आते है. ऐसे में बाजारों में रजाई और कंबल की दुकानों पर ग्राहक पहुंचने लगे हैं.

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ठाकुरगंज. मौसम में धीरे धीरे बदलाव दिखने लगा है. सुबह और शाम के समय ठंड का अहसास होने लगा है. इन दिनों सुबह से मौसम में अचानक बदलाव से लोग घरों के बाहर खुली धूप में सुखाते नजर आते है. ऐसे में बाजारों में रजाई और कंबल की दुकानों पर ग्राहक पहुंचने लगे हैं. रजाई की नए सिरे से भराई का भी काम चल पड़ा है.

प्रतिवर्ष की तरह इस वर्ष कपास (रूई) से सर्दी के लिए तैयार होने वाली रजाई के कारीगर बाजारों में दिखने लगे हैं. सर्दियों का सीजन शुुरू हो गया है और ठाकुरगंज शहर के विभिन्न इलाकों में रूई धुनने वालों की आवाज सुनाई देने लगी है. बताते चले सर्दियों के दौरान तोशक बनाने के लिए सूबे के विभिन्न जिलो से तो कारीगर आते हैं ही कई कारीगर स्थाई रूप से ठाकुरगंज में ही रहते है. जानकारो की माने तो ठाकुरगंज के विभिन्न क्षेत्रों में करीब दो दर्जन कारीगर टीम में काम करते हैं. बाहर से आने वाले ये कारीगर कई महीनों के लिए अलग-अलग इलाकों में मकान किराए पर लेते हैं. सुबह होते ही वे साइकिल से शहर व ग्रामीण इलाकों में निकल पड़ते हैं. शहरवासियों की मांग के अनुरूप कहीं पुरानी रजाई काे फिर रूई धुनकर नया बनाते है, तो कहीं और नई रजाई बनाते हैं. वह ग्राहकों की सुविधा के लिए आवश्यक सामग्री स्वयं ले जाते हैं.

हालांकि, कई वर्षों से रंग-बिरंगे कंबलों की बाजार में बाढ़ आ गई है. इसकी तुलना में हाथ से बने कवर और कुशन की संख्या कम होने लगी है. उनमें से वह जीविकोपार्जन के प्रयासों में पिछली पीढ़ी के पेशे पर निर्भर रहे हैं. सत्तर वर्षीय फिदा हुसैन जो पिछले 55 साल से तो अलादीन भी पिछले 40 साल से इस पेशे से जुड़े है कहते है कंबल के प्रति लोगों के बढ़ते रुझान से उन्हें काम कम मिल रहा है. मांग में कमी और कपास तथा कपड़े की कीमत में वृद्धि के कारण हमारी आय पहले की तुलना में बहुत कम हो गयी है.

काफी वैरायटी है उपलब्ध

कारीगर अमजद ने बताया की इस बार बाजार में रूई की कीमत 80 रुपये से लेकर 200 रुपये प्रति किलो तक है. इसके अलावा विभिन्न प्रकार की रूई उपलब्ध है जिनमें फाइबर, देशी, रॉक्लोन मुख्य हैं जबकि सबसे ज्यादा बिक्री फाइबर देसी रूई के प्रयोग से बनाई गई रजाई व गद्दों की हे. कारीगर अमजद ने बताया कि सामान्यत एक रजाई में 4 से लेकर 5 किलोग्राम तक रूई भरी जाती है जिसमें 70 रुपये प्रति किलो के हिसाब से रूई पिनाई की कीमत हैं. इसके अलावा 80 से 100 रुपये कीमत रजाई की भराई के लिए तय की गई है. इसमें कवर व कपड़ा ग्राहक की पसंद के अनुसार उपलब्ध होता है. सभी प्रकार के खर्च सहित एक हजार रुपये से 1500 रुपये कीमत की रजाई उपलब्ध हैं. एक कारीगर द्वारा एक दिन में चार से पांच रजाई तक बनाई जा रही हैं.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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