खोती जा रही होली की पारंपरिक रंगत व संस्कृति की पहचान

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खोती जा रही होली की पारंपरिक रंगत व संस्कृति की पहचान

खोती जा रही होली की पारंपरिक रंगत व संस्कृति की पहचान

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आधुनिकता व बाजारवाद के प्रभाव में होली की मर्यादा व सांस्कृतिक विरासत हो रही है कमजोर

पौआखाली. रंगों का त्योहार होली, जो कभी आपसी प्रेम, सद्भाव व लोक संस्कृति का प्रतीक हुआ करता था, आज आधुनिकता की चमक-दमक में अपनी पहचान खोता जा रहा है. समय के साथ होली की वह महक व सांस्कृतिक विरासत अब बाजारवाद और फूहड़पन की भेंट चढ़ चुकी है. पहले जहां ढोलक-मंजीरों की थाप पर होली खेली जाती थी, वहीं अब शोर शराबा और कानफोड़ू संगीत में यह पर्व कहीं गुम होता नजर आ रहा है.

डीजे के शोर में विलुप्त हो रहा परंपरागत होली

पहले फाल्गुन के महीने में ही गांवों की चौपालों पर होली का उल्लास छा जाता था. बुजुर्ग लोग कबीर व मीरा के पदों के साथ होली की शुरुआत का समां बांधते थे, लेकिन अब यह जगह द्विअर्थी व फूहड़ संगीत ने ले ली है. डीजे के शोर ने पारंपरिक वाद्य यंत्रों को लगभग विलुप्त कर दिया है. होली के त्योहार की वह मर्यादा, जिसमें छोटे-बड़े का लिहाज होता था, अब केवल शोर-शराबे तक सीमित रह गयी है.

नकली रंगों के प्रयोग से खतरे की आशंका

होली की सूरत बिगाड़ने में नकली रंग भी एक प्रमुख कारण बन गए हैं. आजकल बाजार में मिलने वाले हानिकारक रसायनों से युक्त रंग न केवल त्वचा के लिए नुकसानदायक हैं, बल्कि ये आंखों व स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा पैदा कर रहे हैं. पहले लोग घरों में बने रंगों से होली खेलते थे, जो न केवल सुरक्षित होते थे, बल्कि स्वास्थ्य के लिए लाभकारी भी थे.

गांवों व शहरों की सामूहिक चौपालें बंद कमरे में सिमट रही

गांवों व शहरों की सामूहिक चौपालें अब बंद कमरों की हाउस पार्टी में सिमटकर रह गयी हैं. पहले लोग एक-दूसरे के घर जाकर अबीर डालकर आशीर्वाद लेते थे, और घर में बने गुजिया, दही वड़ा, पापड़ जैसे पारंपरिक पकवानों का स्वाद लेते थे. लेकिन अब यह सब बाजार की मिलावटी मिठाइयों से बदल गया है. होली के आनंद का मतलब अब हुड़दंग व नशे से जुड़ने लगा है, जिससे इस पवित्र त्योहार की गरिमा घट रही है.

लोक कलाओं को संजोने की चिंता

सामाजिक कार्यकर्ताओं व चिंतकों का मानना है कि यदि हम अपने पूर्वजों के समय की मर्यादित, अनुशासित व प्रेम-संवेदनशील होली की संस्कृति की तरफ नहीं लौटे, तो आने वाली पीढ़ियां होली के असली मायने कभी नहीं जान पाएंगी. यह जरूरी है कि हम फिर से रंगों में प्रेम घोलें व लोक कलाओं को जीवित रखें, ताकि बुरा न मानो होली है का असली संदेश किसी का दिल नहीं दुखाए.

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अवधेश कुमार

लेखक के बारे में

By अवधेश कुमार

अवधेश कुमार विगत 25 वर्षों से पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. इन्होंने बतौर पत्रकार अपने कैरियर की शुरूआत वर्ष 2001 से की. उसके बाद विगत 15 वर्षो से प्रभात खबर, किशनगंज के कार्यालय प्रभारी के रूप में कार्यरत हैं. इनकी रूचि राजनीतिक, सामाजिक व अपराध से जुड़ी खबरों में है.

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