ठाकुरगंज प्रखंड के अधिकांश विद्यालयों में नहीं है खेल मैदान, बस्तों के नीचे दबी प्रतिभा

Published by :AWADHESH KUMAR
Published at :11 Dec 2025 6:44 PM (IST)
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ठाकुरगंज प्रखंड के अधिकांश विद्यालयों में नहीं है खेल मैदान, बस्तों के नीचे दबी प्रतिभा

कहा जाता है कि बच्चों के समग्र विकास के लिए पढ़ाई के साथ-साथ खेल भी जरूरी है लेकिन ठाकुरगंज प्रखंड के सरकारी स्कूलों में शायद खेल के साथ ही खेल हो रहा है

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ठाकुरगंज

कहा जाता है कि बच्चों के समग्र विकास के लिए पढ़ाई के साथ-साथ खेल भी जरूरी है लेकिन ठाकुरगंज प्रखंड के सरकारी स्कूलों में शायद खेल के साथ ही खेल हो रहा है. तभी तो प्रखंड के ज्यादातर स्कूलों में खेल के मैदान तक नहीं हैं. हालांकि विद्यालयों में एक कक्षा खेल कूद की भी संचालित होती है लेकिन प्रखंड के ज्यादातर स्कूलों में खेल की कक्षाएं तक संचालित नहीं हो रही हैं क्योंकि 80 प्रतिशत स्कूलों में खेल के मैदान ही नहीं हैं.

गांधी मैदान में क्लब का कब्जा

ग्रामीण क्षेत्रों की तो छोड़ दे नगर क्षेत्र के विद्यालयों की हालत भी इस मामले में बदतर है. नगर के विद्यालयों में खेल के मैदान के मामले में केवल आदर्श मध्य विद्यालय यह दावा कर सकता है कि उसका अपना मैदान है लेकिन यह केवल कागजों में दीखता है. उस गांधी मैदान में भी स्कूली बच्चे तभी दीखते है जब शिक्षा विभाग के प्रखंड स्तरीय या संकुल स्तरीय खेलकूद की तैयारी करनी पड़ती है अन्यथा यह गांधी मैदान क्लब के अधीन ही होने वाले खेल कूद होते दिखता है. इस स्कूल के अलावे नगर के किसी भी स्कूल के पास बड़ा मैदान नहीं है जहां बच्चे खेल कूद कर अपना भविष्य बना सके. हां वॉलीबॉल लायक मैदान स्कूल कैम्पस में ही होने का दावा सभी स्कूल करते है. मिली जानकारी के अनुसार भले ही शिक्षा विभाग के निर्देश के मुताबिक सभी स्कूलों में खेल की कक्षाएं संचालित करना अनिवार्य है लेकिन शिक्षक करें तो क्या करें. मैदान नहीं होने के कारण मजबूरन खेल की कक्षाएं चाहकर भी संचालित नहीं कर पा रहा हैं और इसकी जानकारी स्कूलों की तरफ से समय-समय पर सरकार को दी भी जाती है. वहीं कई वर्षों से स्कूलों में फिजिकल टीचर की भी बहाली नहीं हुई है जिसके कारण ज्यादातर स्कूलों में खेल के शिक्षक भी नहीं हैं और जहां हैं वहां वो दूसरे विषय की पढ़ाई करवाते हैं.

खेलों के मामले में निजी स्कूल आगे

हालांकि पीएम मोदी ने खेलो इंडिया कार्यक्रम के तहत खेल को बढावा देने का प्रयास जरूर किया लेकिन बिहार के स्कूल मानकों पर खरे तक नहीं उतर रहे हैं. आलम यह है कि 70 प्रतिशत स्कूलों में पीटी की कक्षा नहीं ली जा रही है. समझ सकते हैं कि अभी भी निजी स्कूलों और सरकारी स्कूलों में कितने का फर्क है जहां क्रिकेट, वॉलीबॉल से लेकर बैडमिंटन और हॉकी तक सब कुछ ठप है और बच्चे आज भी खेल के लिए लालायित हैं तो बिना खेल के सर्वांगीण विकास भी संभव नहीं दिखता.

सभी स्कूलें में शरीरिक शिक्षकों की बहाली नहीं

इस मामले में विभाग कितना जागरूक है इस मामले में केवल आंकड़ों को देखे तो समझा जा सकता है. प्रखंड में 150 प्राथमिक विद्यालय और 104 मध्य विद्यालय है. इन 254 स्कूलों में कुछ में ही शारीरिक शिक्षकों की नियुक्ति की गई है. सनद रहे स्कूल में पीटी एवं शारीरिक शिक्षकों की नियुक्ति के पीछे भी विद्यार्थियों को खेलों में निपुण बनाए जाने की सोच है मगर इनकी संख्या देख के जमीनी हकीकत को देखा जा सकता है. खेल मैदान के अभाव में खेल प्रतियोगिता में अपना जौहर दिखाने से प्रखंड के बच्चे वंचित रह जाते हैं. जबकि संकुल स्तरीय प्रतियोगिता से लेकर जिला और राज्य स्तर की प्रतियोगिता स्कूली बच्चों के लिए आयोजित की जाती है. अब जब मैदान ही नहीं है तो बच्चे तैयारी करे तो कैसे करें.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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