खेती को व्यावसायिक रूप दे रहे पढ़े-लिखे लोग

Published at :01 Mar 2016 5:53 AM (IST)
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खेती को व्यावसायिक रूप दे रहे पढ़े-लिखे लोग

आज बिहार में कई पढ़े-लिखे लोग नौकरी छोड़ कर इन्हीं किसानों की जमीन लीज पर लेकर खेती को व्यावसायिक स्वरूप दे रहे हैं एवं लाखों रुपये कमा रहे हैं. किशनगंज : कृषि विज्ञान केंद्र में कृषक उत्पादन संगठन एवं उनके संवर्धन पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया. कार्यक्रम की अध्यक्षता नाबार्ड बिहार क्षेत्रीय […]

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आज बिहार में कई पढ़े-लिखे लोग नौकरी छोड़ कर इन्हीं किसानों की जमीन लीज पर लेकर खेती को व्यावसायिक स्वरूप दे रहे हैं एवं लाखों रुपये कमा रहे हैं.

किशनगंज : कृषि विज्ञान केंद्र में कृषक उत्पादन संगठन एवं उनके संवर्धन पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया. कार्यक्रम की अध्यक्षता नाबार्ड बिहार क्षेत्रीय कार्यालय पटना के महाप्रबंधक अवधेश कुमार ने की. कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए अवधेश कुमार ने प्रतिभागियों को बताया कि आज हमारे किसान खाद, बीज, कीटनाशक, आधुनिक कृषि तकनीक, बाजार, इत्यादि की सुलभ उपलब्धता जैसी समस्याओं से परेशान हैं, जिसके कारण खेती एक घाटे का सौदा बन कर रह गयी है. इसके अतिरिक्त बिचौलियों के प्रभाव के कारण उत्पाद की सही कीमत नहीं मिल पाती है.
यही कारण है कि किसान खेती के प्रति उदासीन हो गये हैं एवं छोटा सा भी अवसर मिलने पर वह खेती छोड़ देते हैं. परंतु इसके विपरीत एक सुखद पहलू यह भी है कि आज बिहार में कई पढ़े-लिखे लोग नौकरी छोड़ कर इन्हीं किसानों की जमीन लीज पर लेकर खेती को व्यावसायिक स्वरूप दे रहे हैं एवं लाखों रुपये कमा रहे हैं.
200 किसान उत्पादक कंपनी को पंजीकृत करने का लक्ष्य : भारत सरकार ने इन्हीं समस्याओं के निराकरण के लिए नाबार्ड के सहयोग से किसानों को संगठित कर खेती को उद्यम एवं किसानों को उद्यमी के रूप में विकसित करने के लिए वित्तीय वर्ष 2015-16 में पूरे देश में 200 किसान उत्पादक कंपनी को पंजीकृत करने का लक्ष्य रखा है.
नाबार्ड के जिला विकास प्रबंधक सावन प्रकाश ने उत्पादक संघ से संबंधित सिद्धातों के संबंध में विस्तार से बताते हुए यह कहा कि भू-भागों के छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित होने तथा संगठन के अभाव में भारतीय किसान अपनी पैदावार से अधिकतम मूल्य प्राप्त करने तथा प्रगति करने में असमर्थ हैं. भारत में तकरीबन 12.5 करोड़ से अधिक कृषक परिवार हैं, जिसमें 85 प्रतिशत लघु सीमांत कृषक है जिनकी जोत का आकार दो हेक्टेयर से कम है.
भू-जोतों के छोटे-छोटे टुकड़ों में होने तथा असंगठित होने के कारण कृषकों के लिए नवीनतम प्रौद्योगिकी को अपनाना ही नहीं अपितु बीजों तथा उवर्रकों की उच्च उपज वाली किस्मों का प्रयोग करना भी आर्थिक दृष्टि से व्यवहार्य नहीं है. व्यक्तिगत स्तर पर अपनी उपज बेचने के कारण वे बेचने योग्य अतिरिक्त उपज, को अच्छा भाव वसूल करने में असमर्थ रहते हैं. ऐसे में उत्पादक संघ किसानों की इन समस्याओं के निराकरण की दिशा में एक संभव प्रयास हो सकता है. कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी डा केएम सिंह, आरडीएमओ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी राजू कुमार सिन्हा ने भी कार्यशाला को संबोधित किया.
आंगनबाड़ी का आवंटन अटकने से पोषाहार वितरण अटका
प्रखंड के आंगनबाड़ी केंद्रों के आवंटन अटकने से गरीब नौनिहालों का पोषाहार अटक गया है, जिससे बच्चों की उपस्थिति कम हो गयी है. बच्चों के साथ गर्भवती महिलाओं के लिए कई योजनाएं चल रही हैं. मगर अधिकारियों की लापरवाही के कारण ये सभी सुविधा बंद है.
प्रतिनिधि दिघलबैंक
नौनिहालों को कुपोषण से बचाने तथा उनकी स्वास्थ्य रक्षा के लिए प्रखंड में खुले सैकड़ों आंगनबाड़ी केंद्र स्वयं बीमार हो गया है. आवंटन अटकने से पोषाहार का वितरण भी अटक गया है, जिस कारण केंद्रों पर बच्चों की संख्या नगण्य है. इससे इन केंद्रों के संचालन के औचित्य पर ही सवाल उठने लगे हैं. बताया जाता है कि आंगनबाड़ी केंद्रों पर पोषाहार का वितरण नियमित रूप से करने का नियम है. इस पर बच्चों के साथ गर्भवती महिलाओं के लिए कई योजनाएं चल रही है. मगर अधिकारियों की लापरवाही के कारण ये सभी सुविधाएं बंद है.
जहां चार माह से वितरण बंद हो वहां की हालत क्या होगी समझी जा सकती है. तीन साल से छह साल तक के नौनिहालों को यहां से पोषाहार का प्रबंध होता है. हर हाल में आंगनबाड़ी केंद्रों को चालू रखा जाता है कि बच्चे कुपोषण की चपेट में न आयें. कुछ आंगनबाड़ी सेविका ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि स्थानीय पदाधिकारी की मनमानी एवं आवंटन की मांग न करने के कारण यह दशा हुई है. जिले के अन्य प्रखंडों के आंगनबाड़ी केंद्रों का इतना बुरा हाल नहीं है.
कहती हैं सीडीपीओ
सीडीपीओ सरिता कुमारी ने बताया कि मैं आवंटन नहीं मांगूंगी तो क्या आवंटन नहीं मिलेंगे? सेविका यू हीं बदनाम करती हैं. आवंटन नहीं मिला है यह सत्य है.
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