परबत्ता. पर्यावरण संरक्षण को सुदृढ़ बनाने के सरकारी दावे की हकीकत परबत्ता प्रखंड में साफ नजर आ रहा है. मुख्यालय में स्थापित प्रखंड नर्सरी और विकसित पार्क आज बदहाली की आंसू बहा रहा है. नर्सरी और पार्क को विकसित करने के लिए लाखों रुपये खर्च किये गये थे. हरित बिहार और हरियाली मिशन के तहत परबत्ता की नर्सरी का पुनर्जीवन अब केवल कागजी सपना बनकर रह गया है. वर्षों से विभागीय उदासीनता ऐसी है कि किसी भी जिम्मेदार अधिकारी ने इसे पुनर्जीवित करने की दिशा में ठोस पहल करना जरूरी नहीं समझा. स्थिति यह है कि मुख्यमंत्री पौधा रोपण योजना, जल-जीवन-हरियाली अभियान और मनरेगा के तहत चल रही पौधा रोपण योजनाओं के बावजूद स्थानीय किसानों को बाग-बगीचों के लिए पौधे दूसरे जिले से मंगाने पड़ रहे हैं. कभी जिस नर्सरी से बरसात के मौसम में अनुदानित दर पर फलदार और इमारती लकड़ी के पौधे किसानों को उपलब्ध कराए जाते थे, वहां आज सन्नाटा पसरा हुआ है. जानकार बताते हैं कि परबत्ता प्रखंड की स्थापना के साथ ही स्थानीय बुद्धिजीवियों और अधिकारियों के प्रयास से लगभग तीन एकड़ भूमि में इस नर्सरी की नींव रखी गई थी. दो दशक पूर्व हाजीपुर समेत अन्य क्षेत्रों से नारियल, आम, अमरूद, बेदाना, संतरा, नींबू, सेमल और शीशम जैसे पौधे लाकर किसानों को रियायती दर पर दिए जाते थे. लेकिन विभागीय लापरवाही के चलते बीते करीब 20 वर्षों से यह व्यवस्था पूरी तरह ठप है. नतीजतन, मुख्यमंत्री हरित क्रांति की परिकल्पना यहां कागजों में ही सिमट कर रह गई है.
पड़ोसी जिले पर रह गयी निर्भरता, बाग माली लापता
मनरेगा के तहत होने वाले पौधा रोपण के लिए विभाग और किसान भागलपुर, पूर्णिया और हाजीपुर जैसे जिले से पौधे लाने को विवश हैं. जिस नर्सरी में नवजात पौधों की कतारें होनी चाहिए थी. वहां आज केवल बड़े-बड़े पुराने आम के पेड़ खड़े दिखाई देते हैं. हैरानी की बात यह भी है कि विभाग ने बाग माली के रूप में कर्मी की नियुक्ति तो की है, लेकिन उनका कोई अता-पता नहीं रहता.
लागत लाखों की, परिणाम शून्य
वर्ष 2012 में नर्सरी सुदृढ़ीकरण के नाम पर घेराबंदी में 23,950 रुपये, सिंचाई संरचना पर 49,932 रुपये और माली शेड निर्माण पर 60,000 रुपये खर्च किये गये थे. इसके बावजूद नर्सरी आज भी वीरान पड़ी हुई है. छात्र नेता प्रशांत सुमन, बिट्टू मिश्रा, श्रवण आकाश ने कहा कि यदि संबंधित अधिकारी समय रहते सक्रिय होते तो नर्सरी और पार्क दोनों ही परबत्ता प्रखंड का आदर्श हरित केंद्र बना रहता. उन्होंने प्रशासन से अविलंब ठोस पहल करने की मांग की है. ताकि पर्यावरण संरक्षण की योजनाएं वास्तव में जमीन पर उतर सके.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

