10 माह से 2 साल तक पशु सर्वाधिक होते हैं गलाघोंटू व लंगड़ी बीमारी से प्रभावित

Updated at : 11 Jun 2024 11:54 PM (IST)
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गलाघोंटू व लंगड़ी बीमारी से प्रभावित

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बरसात के मौसम में बढ़ जाता है बीमारी का खतरा, टीकाकरण जरूरी

प्रतिनिधि, खगड़िया

जुलाई-अगस्त महीने यानि बरसात के महीनों में पशुओं को गलाघोंटू व लंगड़ी बीमारी अक्सर परेशान करती है. कभी-कभी तो यह तो बीमारी जानलेवा भी साबित हो जाती है. पशुओं को गलाघोंटू व लंगड़ी बुखार होने पर अगर थोड़ी सी भी लापरवाही बरती जाए तो पशुओं की जान भी चली जाती है. पशु चिकित्सक बताते हैं कि हर साल इन दोनों बीमारी की चपेट में आने से कई पशुओं की जान चली जाती है. जिससे पशु पालकों को आर्थिक नुकसान होता है. पशुओं की जान तथा पशुपालकों को आर्थिक नुकसान से बचाने के लिए पशुपालन विभाग के द्वारा टीकाकरण अभियान भी चलाया जाता रहा है. पशु कर्मी गांव-गांव जाकर पशुओं को लंगड़ी बुखार एवं गलाघोंटू बीमारी का निःशुल्क टीका लगाते रहे हैं. टीकाकरण के बाद पशु इन दोनों बीमारियों के खतड़े से मुक्त हो जाते हैं. जानकार बताते हैं कि टीकाकरण अभियान नहीं भी चलाए जाएं तो पशुपालक को स्वयं भी सचेत रहने की आवश्यकता है.

10 माह से 2 साल तक के पशु होते हैं सर्वाधिक प्रभावित

पशु चिकित्सक डॉ विनोद कुमार बताते हैं कि लंगड़ी बुखार व गलाघोंटू दोनों अलग-अलग रोग है. जो अक्सर वर्षाकाल में गाय एवं भैंस को हो जाती है. यह जीवाणु जनित एवं घातक रोग है. लंगड़ी बुखार 10 माह से 2 वर्ष की उम्र वाले पशुओं को अधिक होती है.लंगड़ी बीमारी में पशु को तेज बुखार आ जाता है. जांघों के ऊपर कंधे या गर्दन पर दर्द एवं सूजन हो जाता है. पहले पशु लंगड़ाकर चलती है. अगर इस बीमारी को पशुपालक नजर अंदाज करते हैं या बीमार पशु समुचित इलाज नहीं कराते हैं सूजन बड़े घाव में बदल जाते हैं. जिससे पशु की मौत भी हो जाती है. डॉ विनोद की माने तो गलाघोंटू लंगड़ी बुखार की तरह खतरनाक बीमारी है. इस बीमारी में तेज बुखार के साथ-साथ गर्दन एवं मुंह पर सूजन आ जाता है. मुंह से तार व नाक से गाढ़ा श्राव निकलने लगता है. अगर शुरुआती दौर में इस बीमारी का इलाज नहीं कराया गया तो बाद में पशुओं को सांस लेने में परेशानी होने लगती है. कहा कि अगर पशु का सांस ही रुक जाए तो वो कितने दिनों तक जिंदा रह पायेगा.

दो महीने से गर्मी का कहर जारी, पशुओं को लेकर सर्तक रहें पशुपालक

जिले में पशुओं की संख्या तीन लाख से अधिक है. जो बीते दो महीने से जारी गर्मी के कहर से परेशान है. वातावरण का तापमान बढ़ने से आमलोगों के साथ-साथ जिले में मौजूद तीन लाख से अधिक गाय/भैंस की सुरक्षा भी जरूरी है. इस स्थित में पशुपालक की थोड़ी सी लापरवाही उनके पशुओं को मौत के मुंह में ढ़केल देगी. पशुओं को हिट स्ट्रोक यानी लू से बचाने के लिए पशुपालन विभाग ने पशुपालकों के लिए कुछ सुझाव जारी किया है. पशुपालक अपने पशुओं को लू/हीट स्ट्रोक से बचाने के लिए विभागीय सुझाव का पूरी तरह अमल करें. क्योंकि गर्मी के कारण बाहर का तापमान और बढ़ गया है. ऐसे में उनके पशुओं को लू लगने का खतरा और अधिक बढ़ गया है. सूर्य की किरण से बचाव करें, हवादार पशुगृह अथवा छायादार वृक्ष के नीचे पशु को बांधे. पशुगृह के दीवार को ठंडा रखें, ताकि बाहर से ठंड हवा अंदर प्रवेश करे.पशुओं के भोजन-पानी पर भी ध्यान देने की जरुरत है. पशु को सुबह अथवा शाम में बाहर चराई के लिए ले जाएं, दोपहर में नहीं. पशु को लू लग जाए तो उसके शरीर के तापमान को नियंत्रित करें, ठंडे स्थान पर रखें. संभव हो तो पशु को गठ्ठे में पानी भरकर उसी में रखें या ठंडे पानी का पूरे शरीर पर छिड़काव करें. पशु चिकिसत्सक के अनुसार तीव्र ज्वर की स्थिति बन जाना,मुंह खोलकर जोर-जोर सांस लेना/हांफना, पशु के मुंह से लार गिरना. क्रियाशीलता कम हो जाना एवं बेचैनी बढ़ जाना,भूख में कमी व प्यास बढ़ जाना. पेशाब कम अथवा बंद हो जाना, धड़कन तेज हो जाना. ये सभी लू लगने के लक्षण हैं.

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