अस्तत्वि खोने के कगार पर है तालाब-पोखर

Published at :09 Dec 2015 9:13 PM (IST)
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अस्तत्वि खोने के कगार पर है तालाब-पोखर

अस्तित्व खोने के कगार पर है तालाब-पोखर प्रतिनिधि, परबत्ता प्रखंड में विगत तीन दशकों में तालाब/पोखरों का अस्तित्व समाप्त हो रहा है. हलांकि तीन तरफ से गंगा नदी से घिरा होने के कारण परबत्ता प्रखंड अपने भौगोलिक बनावट के कारण पोखर/तालाब के लिये अनुकूल नहीं है. प्रखंड के आधे भूभाग में पांच से दस फीट […]

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अस्तित्व खोने के कगार पर है तालाब-पोखर प्रतिनिधि, परबत्ता प्रखंड में विगत तीन दशकों में तालाब/पोखरों का अस्तित्व समाप्त हो रहा है. हलांकि तीन तरफ से गंगा नदी से घिरा होने के कारण परबत्ता प्रखंड अपने भौगोलिक बनावट के कारण पोखर/तालाब के लिये अनुकूल नहीं है. प्रखंड के आधे भूभाग में पांच से दस फीट की गहराई पर सफेद बालू निकल जाता है. इस कारण किसी भी गड्ढे या पोखर का सीधा संबंध गंगा नदी से हो जाता है. इसका परिणाम है कि गंगा के जलस्तर में बढ़ोतरी से परबत्ता प्रखंड के सभी पोखर पानी से लबालब भर जाता है. जबकि जलस्तर में गिरावट से सभी तालाब सुख जाते हैं. इस भौगोलिक कठिनाई के बावजूद प्रखंड में बन्देहरा, महदीपुर, कोलवारा,परबत्ता,कन्हैयाचक आदि गांवों में पोखर/तालाब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. हालांकि वैसा,मड़ैया, अररिया,कुल्हरिया तथा सलारपुर से उत्तर जितने गांव हैं उसमें इस प्रकार की भौगोलिक कठिनाईयां कम हैं. लेकिन सिंचाई से लेकर पेयजल के लिये मशीनों,बोरिंगों तथा चापानल पर बढ़ती निर्भरता ने इन पोखरों को उपेक्षित कर दिया है. प्रखंड मुख्यालय स्थित परबत्ता गांव में पुराने जमींदारों के हाथी के लिये बनाये गये पोखर को विगत दो दशकों से लोगों द्वारा चारों ओर से भर कर आवासीय उपयोग किया जा रहा है. पोखरों की उपेक्षा का यह आलम है कि लोगों द्वारा लोगों द्वारा कई प्रकार से इसे समाप्त किया जा रहा है. आमलोग अभी तक पोखर/तालाबों को कपड़े धोने,मवेशी को नहलाने मात्र का साधन मानते हैं. आमलोग भूगर्भीय जल संरक्षण के विषय में जागरूकता के अभाव में ज्यादा नहीं सोचते हैं. आम लोग पोखरों से होने वाले फायदे पर चर्चा करते समय भी इसके व्यावसायिक उपयोग से अलग अन्य बातों की ओर ध्यान नहीं देते. सरकार द्वारा भूगर्भीय जल के गिरते स्तर को सुधारने को लेकर निजी भूमि पर मनरेगा जैसी योजनाओं से पोखर निर्माण की योजना शुरू किया जा रहा है. इसमें भूमि के मालिक को मछली पालन तथा पौधारोपण का लाभ दिये जाने की बात कही जा रही है. लेकिन उपजाऊ भूमि होने के कारण इसके सफलता के प्रति उदासीनता देखी जाती है. जबकि इसके अलावा प्रखंड की भौगोलिक बनावट के कारण भी इसकी सफलता यहां संदिग्ध है. गोगरी नारायणपुर बांध से तीन ओर से घिरे इस प्रखंड में वर्ष में लगभग छह महीने एक पतली सी धारा डुमड़िया खुर्द, अररिया,बिठला, कुल्हरिया तथा बिशौनी सलारपुर गांव के निकट से बहती है. जिसे जल संसाधन विभाग के द्वारा बिशौनी गांव के निकट बांध में स्लुईस गेट बनाकर गंगा में मिलने का रास्ता बनाया गया है. इस जल का भी सदुपयोग नहीं हो पाता है. जल संरक्षण स्रोत के प्रति सरकारी उदासीनता तथा लोगों में जागरूकता का अभाव का दुष्परिणाम अब दिखने लगा है. तालाब/पोखर के साथ साथ इलाके में कुआं के उपयोग के प्रति भी लोगों में उपेक्षा का भाव बढ़ा है.

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