जिले में 18 हजार टन मछली का हो रहा उत्पादन

Published at :29 Oct 2015 10:20 PM (IST)
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जिले में 18 हजार टन मछली का हो रहा उत्पादन

जिले में 18 हजार टन मछली का हो रहा उत्पादन फोटो 8 व 9 में : कैप्सन: तालाब व मछली बेचती महिला.वर्ष 2014-15 में 50 तालाबों का किया गया निर्माणप्रति हेक्टेयर यूनिट पर 50 प्रतिशत मिलता है अनुदानप्रत्येक वर्ष लगभग 10 हजार टन मछली का होता है निर्यातदेसी मछली जिले-वासियों को नसीब नहींविदेशी मछली के […]

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जिले में 18 हजार टन मछली का हो रहा उत्पादन फोटो 8 व 9 में : कैप्सन: तालाब व मछली बेचती महिला.वर्ष 2014-15 में 50 तालाबों का किया गया निर्माणप्रति हेक्टेयर यूनिट पर 50 प्रतिशत मिलता है अनुदानप्रत्येक वर्ष लगभग 10 हजार टन मछली का होता है निर्यातदेसी मछली जिले-वासियों को नसीब नहींविदेशी मछली के दाम छू रहे आसमानकहां कितने तालाब का हुआ निर्माणखगड़िया 03मानसी 03चौथम 10बेलदौर 07परबत्ता 09अलौली 08गोगरी 07प्रतिनिधि, खगड़ियाजिले के सभी प्रखंड क्षेत्रों में सभी उपजाति की मछलियों का प्रतिवर्ष लगभग 18 हजार टन उत्पादन होता है, फिर भी जिले के लोगों को देसी मछली नसीब नहीं हो रही है. कारण, प्रतिवर्ष अन्य राज्यों में लगभग 10 हजार टन मछली का निर्यात कर दिया जाता है. इधर मत्स्य पदाधिकारी अंजनी कुमार ने बताया कि विभाग द्वारा प्रत्येक मत्स्य पालकों को प्रति हेक्टेयर यूनिट तीन लाख 90 हजार में 50 प्रतिशत अनुदान दिया जाता है. उन्होंने बताया कि राज्य में कई तरह की मछलियां विलुप्त होने के कगार पर हैं. जिले के सभी प्रखंड क्षेत्रों में वर्ष 14-15 आद्रभूमि योजना के तहत लगभग 50 तालाब का निर्माण किया गया है. इसमें मछली पालन का कार्य मत्स्य पालकों द्वारा किया जा रहा है. जिले के इच्छुक मत्स्य पालकों को प्रेरित कर 50 तालाब का निर्माण कराया गया है. इसमें मतस्य पालकों के 15 आवेदन के विरुद्ध आठ आवेदन पर विभिन्न बैंकों के द्वारा ऋण देने की स्वीकृति दी गयी है. शेष पर कार्रवाई की जा रही है. कहां भेजी जाती हैं मछलियांजिले से लगभग दस हजार टन अमृतसर, अंबाला, दिल्ली, गुवाहाटी, सिलीगुड़ी, मालदह के अलावा नेपाल भी प्रत्येक वर्ष मछलियां भेजी जाती हैं. श्री कुमार ने बताया कि जिले के मत्स्य पालकों को मछली के अच्छे उत्पादन को लेकर प्रशिक्षण दिया जाता है और प्रशिक्षण प्राप्त कर मछली पालन में बढ़ोत्तरी होती है. कौन-कौन मछलियां हो रहीं विलुप्तजिले में कबइ, दरही, पबदा, मोच, बसहरी, कुर्सा, कौआ, पलवा, चेचरा, बाभी, गैंची आदि मछलियां विलुप्त होने के कगार पर हैं. इसके जगह अपर जाति के रूप में विदेशी मछलियां का उत्पादन किया जाता है.कहते हैं मत्स्य पदाधिकारी जिला मत्स्य पदाधिकारी अंजनी कुमार ने बताया कि जिले में तालाब, पोखर के अभाव के विरुद्ध प्राकृतिक जल संसाधन की बेहतर व्यवस्था है. जिले में कई जलकर के नदियों की धारा टूट जाने के कारण नदियों में मछली के भाग जाने तथा दबंगों द्वारा नदियों पर कब्जा को लेकर मत्स्य पालकों को काफी कठिनाई हो रही है.

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