विश्व पर्यावरण दिवस विशेष: ... अब नहीं संभले तो सांस लेना भी हो जायेगा मुश्किल
Published by : RAJKISHOR K Updated At : 04 Jun 2026 6:31 PM
विश्व पर्यावरण दिवस विशेष: ... अब नहीं संभले तो सांस लेना भी हो जायेगा मुश्किल
चुनौती बनी हुई है पर्यावरण संकट, सूखने लगे हैं तालाब, जन जीवन पर भी प्रतिकूल असर
कटिहारबदलती जीवन शैली व तथाकथित विकास मॉडल की वजह से आज वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संकट एक गंभीर चुनौती बन गया है. कल यानी शुक्रवार को विश्व पर्यावरण दिवस है. इस दिवस पर प्रदेश व देश के स्तर पर विभिन्न आयोजन के जरिये पर्यावरण संरक्षण की अपील की जाती है तथा संकल्प भी दोहराया जाता है. पर, उपभोक्तावादी संस्कृति का पर्यावरण संकट को बढ़ाने में बड़ी भूमिका है. कटिहार जिले में पर्यावरण संकट कम नहीं है. पर्यावरण संरक्षण के लिए जिस तरह से मुहिम चलनी चाहिए. वैसा मुहिम नहीं चलती है. वन विभाग भी इस मामले में अपेक्षित भूमिका अदा नहीं करती है. सरकार के दिशानिर्देश के आलोक में कभी-कभी पौधारोपण का अभियान जरूर चलाया जाता है. पर्यावरण संकट को कई रूपों में देखा जा रहा है. छोटे बड़े सभी तालाब सूखने लगे है.
पेड़ पौधा भी समय से पहले सुख जाते है. स्वास्थ्य पर भी व्यापक असर पड़ रहा है. जल प्रदूषित हो रही है. बारिश के मौसम में अपेक्षित बारिश नहीं होती है जब बारिश का मौसम नहीं होता है. तब मुसलाधार बारिश होने लगती है. शहरीकरण की वजह से भी पर्यावरण संकट उत्पन्न हुआ है. मोबाइल टावर, बड़े बड़े मॉल, औद्योगिक प्रतिष्ठान के लगने से भी पर्यावरण संकट बढ़ा है. हाल के वर्षो में कटिहार की हवा भी जहरीली हुई है. एयर क्वालिटी इंडेक्स के अनुसार रविवार को भी कटिहार के वायु स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से काफी हानिकारक है. दरअसल, पर्यावरण को बचाने का एक प्रमुख साधन पेड़-पौधे ही हैं. कटिहार जिले में पेड़-पौधे अत्यधिक नहीं होने की वजह से पर्यावरण संकट बढ़ा है. जानकारों की मानें, तो जिले के पूरे भू-भाग में से एक तिहाई क्षेत्र में पेड़-पौधे होने चाहिये, लेकिन मात्र 10 फीसदी भू-भाग पर ही पेड़ पौधे लगे हुए हैं. दरअसल जिस रफ्तार से पेड़-पौधों की कटाई हो रही है, उसके अनुरूप पौधारोपण नहीं किया जाता है. इससे पर्यावरण असंतुलन की स्थिति बन गयी है. खासकर उपभोक्तावादी संस्कृति की वजह से लोग पर्यावरण के प्रति उदासीन बने हुए हैं. बढ़ती आबादी की तुलना में जितने पेड़-पौधों की जरूरत प्राकृतिक संतुलन बनाये रखने के लिए जरूरी है. उसके हिसाब से जिले में पेड़-पौधे की भारी कमी है.
सुख गये 80 प्रतिशत से अधिक छोटे-बड़े तालाब
जल का सबसे बेहतरीन स्रोत तालाब है. लेकिन तालाब का अस्तित्व ही इन दिनों खतरे में है. यूं तो जिले के शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में कई तालाब है. जिले में कई प्रमुख नदियां भी है. पर इन नदियों और तालाबों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है. बाजारवाद के इस दौर में सर्वाधिक नुकसान प्राकृतिक संपदा को हो रही है. इसमें नदी व तालाब भी शामिल है. पर्यावरण प्रदूषण की वजह से बढ़ती तपिश व गरमी ने पानी के स्तर को काफी नीचे कर दिया है. स्थानीय विभागीय आंकड़ों पर भरोसा करें, तो जिले के 80 फीसदी से अधिक छोटे-बड़े तालाब पूरी तरह सूख गये हैं. नदी तालाब के सूखने से मनुष्यों सहित जीव-जन्तुओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है. नदी तालाब के सूखने से खासकर जलीय जीव व पौधाें पर गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है. संरक्षण के अभाव में कई जलीय जीव विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुके हैं. कटिहार जिले में तालाब व नदी को बचाने के लिए सरकारी व गैर सरकारी स्तर पर अब तक सिर्फ खानापूर्ति होती रही है. जिला मत्स्य विभाग के कार्यालय के अनुसार कटिहार जिले में करीब 936 जलकर है. जिसे राजस्व विभाग के द्वारा मत्स्य विभाग को हस्तांतरित किया गया है. इनमें से करीब आधा दर्जन जलकर बड़ी नदियों में विलीन हो गया है. अब मत्स्य कार्यालय के पास करीब 930 जलकर बचा हुआ है. अधिकांश जलकर अतिक्रमण का शिकार है. साथ ही कई अन्य तरह से भी जलकर व तालाबों को नुकसान पहुंचाने की प्रक्रिया भी चल रही है.पॉलीथिन का हो रहा है धड़ल्ले से उपयोग
जिले के शहरी क्षेत्र में पॉलीथीन के रोक के बावजूद धड़ल्ले से इसका उपयोग किया जा रहा है. पर्यावरण प्रदूषण बढ़ाने में पॉलीथिन का बहुत बड़ा योगदान है. मिट्टी को प्रदूषित करने के साथ-साथ पॉलीथिन कई तरह से पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है. पर्यावरण संकट का प्रमुख कारण पॉलीथिन के होने के वजह से ही राज्य सरकार ने पॉलिथीन कैरी बैग पर प्रतिबंध लगाया है. हालांकि प्रतिबंध के कुछ माह तक पॉलीथिन का उपयोग बंद जरूर हुआ. लेकिन प्रशासनिक निगरानी नहीं होने की वजह से फिर से पॉलीथिन का उपयोग धडल्ले से होने लगा है. शहरी क्षेत्रों की नकल ग्रामीण क्षेत्रों में भी होने लगे है. ग्रामीण क्षेत्रों के छोटे-बड़े बाजार या हाट में भी पॉलीथिन का उपयोग धड़ल्ले से हो रही है. प्रशासन पॉलीथिन के उपयोग की रोकथाम के मामले में पूरी तरह उदासीन बना हुआ है.जहरीली होने लगी है हवाएं
पर्यावरण के अन्य क्षेत्रों में संकट होने के साथ-साथ वायु प्रदूषण भी बड़ी तेजी से बढ़ने लगी है. कटिहार की हवा में कई तरह के प्रदूषण फैलने लगी है. यह बात एयर क्वालिटी इंडेक्स से भी पता चलता है. बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद की ओर से एयर क्वालिटी इंडेक्स के लिए यहां यंत्र लगाया गया है. पिछले कई महीनों में कई बार कटिहार काक्वालिटी इंडेक्स काफी खतरनाक स्थिति में रहा है. स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी कटिहार का एयर क्वालिटी इंडेक्स काफी नुकसानदायक है. एयर क्वालिटी इंडेक्स के अनुसार गुरुवार 04 जून को भी 101 रहा है. जो स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से खतरनाक है. यानी यह माना जा रहा है कि कटिहार की हवाएं जहरीली हो चुकी है, जो यहां के लोगों के स्वास्थ्य पर धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा रहा है.कहते हैं पर्यावरणविद
जाने-माने पर्यावरणविद् डॉ टीएन तारक ने प्रभात खबर के साथ बातचीत में कहा कि पर्यावरण के लिए कई तरह के गंभीर संकट उत्पन्न होने लगे है. आम लोगों के जीवन शैली व विकास के मॉडल भी पर्यावरण संकट के लिए खास तौर से जिम्मेदार है. पर्यावरण संकट से बचाव का एक ही तरीका है कि हम अधिक से अधिक पौधारोपण करें. अधिक से अधिक पेड़ ही पर्यावरण संकट से हमें बचा सकती है. आम लोगों को भी पेड़ लगाने में दिलचस्पी लेनी चाहिए तथा जितना हो सके पर्यावरण संकट से बचाव में सहयोग करना चाहिए.प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
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