Katihar: जीविका की बड़ी पहल: "दीदी का सिलाई घर" बना हजारों महिलाओं की कमाई का मजबूत सहारा

Published by : Shruti Kumari Updated At : 14 May 2026 10:32 AM

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संस्थान में सिलाई करती महिलायें

इस पहल के माध्यम से महिलाएं आंगनबाड़ी केंद्रों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए पोशाक सिलाई का कार्य कर रही हैं, जिससे उनकी आय बढ़ रही है और समाज में उनकी नई पहचान बन रही है.

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फलका में महिला सशक्तिकरण की नई उड़ान, 1270 जीविका दीदियों को मिला रोजगार

फलका, कटिहार से अली अहमद की रिपोर्ट:

कटिहार: जिले के फलका प्रखंड में सहमति जीविका महिला विकास स्वावलंबी सहकारी समिति द्वारा संचालित “दीदी का सिलाई घर” ग्रामीण महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता, सम्मानजनक रोजगार और महिला सशक्तिकरण का मजबूत केंद्र बनकर उभरा है. इस पहल के माध्यम से महिलाएं आंगनबाड़ी केंद्रों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए पोशाक सिलाई का कार्य कर रही हैं, जिससे उनकी आय बढ़ रही है और समाज में उनकी नई पहचान बन रही है.

यह केंद्र ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. यहां जुड़ी महिलाएं न केवल अपने परिवार की आर्थिक स्थिति सुधार रही हैं, बल्कि सामाजिक विकास में भी सक्रिय योगदान दे रही हैं. जीविका द्वारा संचालित यह सिलाई घर स्थानीय संकुल संघों की देखरेख में स्वच्छ और व्यवस्थित तरीके से चलाया जा रहा है.

कटिहार जिले के आंगनबाड़ी केंद्रों में पढ़ने वाले लगभग 1.20 लाख बच्चों के लिए पोशाक सिलाई का कार्य किया जा रहा है. इस पहल से जहां बच्चों को समय पर ड्रेस उपलब्ध हो रही है, वहीं दूसरी ओर बड़ी संख्या में महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा हुए हैं. जिले के 32 संकुल संघों के माध्यम से वस्त्र सिलाई केंद्र संचालित किए जा रहे हैं, जिनसे करीब 1270 जीविका दीदियां और उनके परिवार लाभान्वित हो रहे हैं.

जानकारी के अनुसार, अब तक 2612 जीविका दीदियों को सिलाई कार्य का प्रशिक्षण दिया जा चुका है, जिनमें से लगभग 1270 महिलाएं नियमित रूप से सिलाई कार्य कर रही हैं और इससे आय अर्जित कर रही हैं.

सहमति जीविका महिला विकास स्वावलंबी सहकारी समिति, फलका के कार्यालय परिसर में जिला स्तरीय वस्त्र कटाई केंद्र भी स्थापित किया गया है, जहां आधुनिक मशीनों एवं उपकरणों की व्यवस्था की गई है. इसमें बटन मशीन, इंटरलॉकिंग मशीन, पेस्टिंग और आयरन मशीन जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं, जिससे काम की गुणवत्ता और उत्पादन क्षमता दोनों में सुधार हुआ है.

पहले महिलाओं को हाथ से बटन लगाने जैसे काम में अधिक समय लगता था, लेकिन अब आधुनिक मशीनों के उपयोग से कम समय में अधिक उत्पादन संभव हो पाया है. इससे पोशाक निर्माण की क्षमता कई गुना बढ़ गई है.

अब तक जिले में लगभग 95,600 सेट पोशाक तैयार किए जा चुके हैं, जिनमें से करीब 70,000 बच्चों को आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से वितरित भी किया जा चुका है.

कुल मिलाकर “दीदी का सिलाई घर” न केवल रोजगार का साधन बना है, बल्कि यह ग्रामीण महिलाओं के आत्मविश्वास, सम्मान और सशक्तिकरण की एक मजबूत मिसाल भी पेश कर रहा है.

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