कटे हुए तटबंध को बांधने आये मजदूरों को खदेड़ा

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 11 Sep 2017 12:40 PM

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बांध बांधने का ग्रामीण कर रहे विरोध कदवा : प्रखंड मुख्यालय से महज डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित शिवगंज मोड़ के सामने बाढ़ के पानी से कटे महानंदा तटबंध को प्रशासन के आदेश पर मरम्मत कर बांधने आये मजदूरों को रविवार को बाढ़पीड़ितों ने खदेड़ दिया. बाढ़ पीड़ितों का कहना है कि इसी तटबंध […]

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बांध बांधने का ग्रामीण कर रहे विरोध

कदवा : प्रखंड मुख्यालय से महज डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित शिवगंज मोड़ के सामने बाढ़ के पानी से कटे महानंदा तटबंध को प्रशासन के आदेश पर मरम्मत कर बांधने आये मजदूरों को रविवार को बाढ़पीड़ितों ने खदेड़ दिया. बाढ़ पीड़ितों का कहना है कि इसी तटबंध की वजह से हजारों लोग बेघर हो गये. यदि तटबंध नहीं होता, तो इतनी परेशानी बाढ़ में नहीं झेलनी पड़ती. बांध टूटने के बाद एकाएक आये पानी ने सब कुछ बरबाद कर दिया है. लोग दाने-दाने को मोहताज हो गये हैं.

ज्ञात हो कि 14 अगस्त को महानंदा एवं रिंगा नदी के जल स्तर में बढ़ते पानी के दबाव से शिवगंज मोड़ काली मंदिर के सामने महानंदा तटबंध कट गया था. इस कारण महानंदा तटबंध के अंदर निवास करने वाले पंचायत भर्री, गोपीनगर, परभेली, गेठौरा, चौनी, जाजा, धनगामा, धपरसिया आदि के लाखों लोगों को बाढ़ ने पूरी तरह से तबाह व बर्बाद कर दिया. हजारों एकड़ में लगी फसल बर्बाद हो गयी. घर समेत समान बर्बाद हो गया. लोग सड़क पर आ गये हैं, जबकि महानंदा तटबंध के बाहर वाले आधा दर्जन पंचायतों में क्रमशः कुम्हड़ी, सागरथ, कदवा, कंटिया, मोहम्मदपुर एवं पहलागढ़ में कटे तटबंध से बाढ़ का पानी प्रवेश कर गया. इससे त्राहिमाम की स्थिति उत्पन्न हो गयी. यहां तक कि प्रखंड मुख्यालय एवं थाना मुख्यालय कदवा के प्रांगण में चार से पांच फीट पानी का जमाव भी हो गया. ऐसी स्थिति में सरकारी पदाधिकारी एवं कर्मी अपनी जान की दुहाई ईश्वर से कर रहे थे.

स्थानीय लोगों एवं जनप्रतिनिधियों का कहना है कि तटबन्ध को सरकार द्वारा बिना स्लूइस गेट के बांध दिया जाना गलत है. प्रत्येक वर्ष महानंदा तटबंध के भीतर निवास करने वाले उक्त पंचायतों के लाखों लोगों को बाढ़ झेलना पड़ता है. लोगों का कहना है कि चार से पांच पूर्व में तटबंध खुला रहने से महानंदा और रिंगा नदियों का पानी खुले तटबंध के रास्ते धीरे धीरे चला जाता था. जिससे किसी को परेशानी नहीं होती थी. किसानों के फसल भी होते थे. पिछले 15 वर्ष तक तटबन्ध खुला था तो बाढ़ की समस्या नहीं उत्पन्न हुई थी और न ही सरकार को रिलीफ आदि ही देना पड़ा था. परंतु पिछले चार पांच वर्षों से स्थानीय जनप्रतिनिधि और लोगों के विरोध के बाद भी तटबंध बांधा गया तो उक्त स्थिति उत्पन्न हुई है. किसानों के सैकड़ों एकड़ भूमि में बालू के रेत भर गये, जो अब खेती के लायक नहीं रह गया है. ऊपर से खेतों में लगे फसल भी पानी में बह गये.

ऐसी स्थिति में इन किसानों के समक्ष आजीविका के लिए कोई विकल्प नहीं रह गया है. किसानों में हाहाकार की स्थिति उत्पन्न है. फसल क्षति मुआवजा के नाम पर चंद रुपये किसानों को देकर अपना पल्ला झाड़ लेगी. पश्चात बालू के ढेर पर अपने बर्बाद खेतों का क्या करेंगे. अपने आजीविका की चिंता ऐसी स्थिति में इन्हें चैन से सोने भी नहीं दे रहा है. बहरहाल कटे तटबन्ध को बांधने आये मजदूरों को स्थानीय आक्रोशित लोगों ने खदेड़ दिया. आक्रोशित लोग तटबन्ध को बांधने आये पदाधिकारी और कर्मचारी को ढूंढ़ रहे थे.

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