कैमूर की पहाड़ी पर मिला चौथी सदी का शैलचित्र व शिलालेख, ‘राजा कुल चंद्र’ का उल्लेख
Published by : Rajeev Kumar Updated At : 04 Jun 2026 12:37 PM
अवस्थित शिलालेख व शैलचित्र पर मानव व पशुओं का अंकन.
Kaimur News : खजुरा-सरैया गांव की पहाड़ी पर धरातल से लगभग एक हजार फीट की ऊंचाई पर दक्षिण-पूर्वी हिस्से में स्थित एक विशाल ओसारा नुमा चट्टान के निचले भाग में मानव एवं पशुओं के शैलचित्र अंकित मिले हैं.
Kaimur News : (राजू कुमार की रिपोर्ट)
कैमूर जिला एक बार फिर अपनी प्राचीन सभ्यता और सांस्कृतिक विरासत को लेकर चर्चा में है. प्रखंड क्षेत्र की पसाई पंचायत अंतर्गत खजुरा-सरैया पहाड़ी की चोटी पर चौथी सदी का एक प्राचीन शैलचित्र और धम्म लिपि में अंकित शिलालेख मिलने का दावा किया गया है. भाषा वैज्ञानिकों और इतिहास के जानकारों के अनुसार यह खोज कैमूर के इतिहास को चौथी सदी से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकती है.
एक हजार फीट ऊंची पहाड़ी पर मिला साक्ष्य
जानकारी के अनुसार खजुरा-सरैया गांव की पहाड़ी पर धरातल से लगभग एक हजार फीट की ऊंचाई पर दक्षिण-पूर्वी हिस्से में स्थित एक विशाल ओसारा नुमा चट्टान के निचले भाग में मानव एवं पशुओं के शैलचित्र अंकित मिले हैं. वहीं, शैलचित्र स्थल से लगभग 50 फीट पूर्व दिशा में एक शिलालेख भी मिला है, जिस पर प्राचीन लिपि में लेख अंकित है.
ग्रामीणों के लिए ‘सीता जी का ओसारा’
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार यह स्थल वर्षों से अस्तित्व में है. सरैया, खजुरा, मझियाव और सोनवर्षा गांव के बुजुर्गों का कहना है कि उनके पूर्वजों के समय से ही यह शिलालेख और शैलचित्र यहां मौजूद हैं. ग्रामीण इस स्थान को ‘सीता जी का ओसारा’ के नाम से जानते हैं, हालांकि इसके ऐतिहासिक महत्व की जानकारी अब तक उन्हें नहीं थी.
ऐसे सामने आई ऐतिहासिक खोज
बेलांव गांव निवासी मृत्युंजय सिंह मौर्य, प्रदीप कुमार गुप्ता तथा स्थानीय युवक इंदल कुमार और विजय राम उत्सुकतावश पहाड़ी पर पहुंचे थे. दुर्गम चढ़ाई पार कर जब वे चोटी तक पहुंचे तो उन्हें शैलचित्र और शिलालेख दिखाई दिया. लिपि को समझ नहीं पाने पर उन्होंने इसकी जानकारी स्थानीय पत्रकारों को दी. स्थल निरीक्षण के दौरान चट्टानों पर बने चित्र और समीप स्थित शिलालेख की पुष्टि हुई.
दुर्गम रास्ते के कारण नहीं पहुंच पाया विभाग
स्थानीय लोगों के अनुसार खजुरा-सरैया फाटक फॉल तक तो कुछ हद तक रास्ता है, लेकिन उसके बाद लगभग 700 फीट की कठिन चढ़ाई कंटीली झाड़ियों, विशाल चट्टानों और फिसलन भरे पत्थरों के बीच से होकर करनी पड़ती है. जरा सी चूक होने पर गहरी खाई में गिरने का खतरा बना रहता है. माना जा रहा है कि इसी वजह से अब तक पुरातत्व विभाग की नजर इस स्थल पर नहीं पड़ सकी.

भाषा वैज्ञानिक ने पढ़ा शिलालेख
एस.पी. जैन कॉलेज, सासाराम के भाषा वैज्ञानिक डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह को शिलालेख और शैलचित्रों की तस्वीरें उपलब्ध कराई गईं. अध्ययन के बाद उन्होंने बताया कि शैलचित्र अत्यंत प्राचीन प्रतीत होते हैं, जिनमें मानव और पशुओं का चित्रण किया गया है.
डॉ. सिंह के अनुसार शिलालेख में ‘राजा कुल चंद्र’ का उल्लेख मिलता है तथा इसकी लिपि चौथी सदी की धम्म लिपि है. उन्होंने बताया कि यह क्षेत्र कभी राजा फुदी चंद्र के शासन क्षेत्र का हिस्सा रहा होगा. फुदी चंद्र को चेरोवंशीय शासक माना जाता है, जिनका उल्लेख ऐतिहासिक अभिलेखों में मिलता है. संभावना है कि शिलालेख में वर्णित राजा कुल चंद्र, फुदी चंद्र के पूर्ववर्ती शासक रहे हों.
संरक्षण और शोध की जरूरत
इतिहास और पुरातत्व के जानकारों का मानना है कि यह खोज कैमूर के प्राचीन इतिहास के अध्ययन में नई दिशा दे सकती है. स्थानीय लोगों ने पुरातत्व विभाग से स्थल का सर्वेक्षण कर संरक्षण और विस्तृत शोध कराने की मांग की है, ताकि इस ऐतिहासिक धरोहर की वास्तविकता और महत्व को सामने लाया जा सके.
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