मजदूरों को नहीं मिल रही वाजिब मजदूरी कम समय में बिचौलिया बन रहे हैं सेठ
Edited by Prabhat Khabar Digital Desk
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सिमुलतला : हर वर्ष मजदूर दिवस आते है विभिन्न सरकारी व गैर सरकारी संस्थानों में इस अवसर को यादकर बनाने की होड़ रहती है. लेकिन मजदूरों की दिनचर्या में बदलाव लाने पर कोई गंभीर नही है. पीढ़ी दर पीढ़ी के बाद मजदूरों के वंशज आज भी मजदूरी करने को बाध्य हैं. जबकि मजदूरी करवाने वाले […]
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सिमुलतला : हर वर्ष मजदूर दिवस आते है विभिन्न सरकारी व गैर सरकारी संस्थानों में इस अवसर को यादकर बनाने की होड़ रहती है. लेकिन मजदूरों की दिनचर्या में बदलाव लाने पर कोई गंभीर नही है. पीढ़ी दर पीढ़ी के बाद मजदूरों के वंशज आज भी मजदूरी करने को बाध्य हैं. जबकि मजदूरी करवाने वाले बिचौलिया सेठ बन रहे है.
आंकड़े के मुताबिक क्षेत्र के खुरंडा, कनौदी व टेलवा पंचायत में लगभग तीन से चार हजार लोग सिमुलतला, देवघर, जसीडीह एवं अन्य शहरों में रिक्शा, ठेला चलाने एवं कंस्ट्रक्शन कार्यों में दैनिक मजदूरी करते है. लगभग चार हजार महिला बीड़ी बनाने का काम करती है और क्षेत्र के 90 फीसदी बेरोजगार युवा प्रदेश के अन्य शहरों में मजदूरी करते हैं.
मजदूरों को मजदूरी स्थल तक पहुचाने वाला बिचौलिया या उनसे काम लेने वाले ठीकेदार बहुत कम समय में ही धनी बन जाता है. लेकिन इन मजदूरों के हालात में कोई बदलाव नहीं आया है. यदि क्षेत्र के बीड़ी मजदूरों की समस्याओं पर गौर किया जाय तो एक बीड़ी मजदूर को प्रति एक हजार बीड़ी बनाने की मजदूरी मात्र 80 रुपया दिया जाता है. जबकि सरकार द्वारा प्रति हजार बीड़ी बनाने की मजदूरी 120 रुपया निर्धारित है. एक बीड़ी मजदूर कड़ी मेहनत करने के बाद किसी तरह एक दिन में एक हजार बीड़ी बनाने में सफल हो पाता है. उस परिस्थिति में उसे मजदूरी के एवज में मात्र 80 रुपया का आय होता है. जा इस मंहगाई के जमाने में बहुत कारगर नहीं होता है और बीड़ी बनवाने वाले बिचौलिया की आय पर गौर किया जाय तो कोई भी ईमानदार शख्स एक बार चौक जरूर जायेगा. यदि बीड़ी ठीकेदारों की संपत्तियों पर आयकर विभाग की जांच हो तो निश्चित ही चौकाने वाले परिणाम सामने आ सकते है. लेकिन इन लोगों पर कार्रवाई बिरले ही नजर आता है. और यही कारण है कि मजदूर की निचली पीढियां पुनः मजदूर बन जाते है. आज मजदूर दिवस के अवसर पर विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों के माध्यम से मजदूरों को सम्मानित करने का प्रचलन है. क्या इस प्रकार की हकमारी को रोककर, उन्हें उनका वाजिब मजदूरी या अधिकार दिलाकर उन्हें सम्मानित नहीं किया जा सकता है. आये दिन दो जून की रोटी के लिए दर-दर की ठोकर खाने वाले मजदूरों के लिए इससे बड़ा और क्या सम्मान हो सकता है.
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