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वैशाली महोत्सव की नींव रखने वाले माथुर साहब को भूल गयी वैशाली

वैशाली को इतिहास के पन्नों से बाहर निकाल कर नयी ऊंचाई देने वाले महान इतिहासकार एवं कुशल प्रशासक स्वर्गीय जगदीश चंद्र माथुर को आज जिला प्रशासन व वैशाली के लोग भूल चुके हैं. 14 मई को उनकी पुण्यतिथि ली, लेकिन वैशाली में उनका स्मारक स्थल वीरान पड़ा था. उनकी पुण्यतिथि पर किसी को उनकी याद नहीं आयी.

वैशाली. वैशाली को इतिहास के पन्नों से बाहर निकाल कर नयी ऊंचाई देने वाले महान इतिहासकार एवं कुशल प्रशासक स्वर्गीय जगदीश चंद्र माथुर को आज जिला प्रशासन व वैशाली के लोग भूल चुके हैं. 14 मई को उनकी पुण्यतिथि ली, लेकिन वैशाली में उनका स्मारक स्थल वीरान पड़ा था. उनकी पुण्यतिथि पर किसी को उनकी याद नहीं आयी. उत्तर प्रदेश के खुर्जा में 16 जुलाई 1917 को जन्मे जदगीश चंद्र माथुर वर्ष 1941 में इंडियन सिविल सर्विस मे चुनें गए थे. हाजीपुर अनुमंडलाधिकारी के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने वैशाली को इतिहास के पन्नों से बाहर निकालकर लोगों के समक्ष रखा. वैशाली के विकास के लिए उस समय के अपने सहयोगी डॉ योगेंद्र मिश्रा, जगन्नाथ प्रसाद साहू ,महान शिल्पी उपेंद्र महारथी के साथ मिलकर वैशाली के विकास के लिए कई कार्य किये. वैशाली संघ की स्थापना एवं वैशाली महोत्सव का प्रारंभ उनके सबसे खास कार्य थे. वैशाली महोत्सव का जब तक आयोजन होता रहेगा, माथुर साहब की यादें हमेशा ताजी रहेगी, भले ही उस दिन भी इन्हें कोई याद करें या न करें. उनका निधन 14 मई 1978 को हुआ था.

वैशाली के प्रो रामनरेश राय, प्रो विनय पासवान, इंद्रदेव राय, मनोज सिह, मंटुन सिंह, राजीव सिंह, विवेक कुमार निक्कू, चंदन कुमार आदि ने दुख व्यक्त करते हुए कहा कि जिस व्यक्ति ने जिस शख्स ने वैशाली के इतिहास को पुनर्जीवित करने के लिए कई कार्य किये. वैशाली महोत्सव की नींव रखी. उनकी स्मृति को याद रखने के लिए अभिषेक पुष्करणी के तट पर स्थित निरीक्षण भवन में 29 मार्च 1991 को उनकी एक प्रतिमा लगायी गयी थी. लेकिन आज उनकी पुण्यतिथि पर वह स्थल वीरान पड़ा है. आज वैशाली में कोई भी ऐसा व्यक्ति चाहे वह किसी भी राजनीतिक दल से जुड़ा हो या सामाजिक कार्यकर्ता हो किसी को माथुर साहब याद नहीं. माथुर साहब ने अपनी रचना भोर का तारा में लिखा था, अकेला एक टक देखता रहता है एक तारा, की पंक्तियां उनकी पुण्यतिथि पर चरितार्थ होती दिख रही है.

प्रतिभा के धनी थे जगदीशचंद्र माथुर

जगदीशचंद्र माथुर प्रतिभा के धनी थे. वे 14-15 वर्ष की आयु से ही लिखने लगे थे. नाटककार के रूप मे विख्यात माथुर साहब ने अपनी विशिष्ट शैली में चरित लेख, ललित निबंध और नाट्य निबंध भी लिखे है. लेखन मे इनकी इतनी रुचि थी कि जिन विभागों मे उन्होंने काम किया उनकी समस्याओं के संबंध मे भी बराबर लिखा. उनकी आरंभिक रचनाएं उस समय की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं-चांद, भारत, माधुरी, सरस्वती और रूपाभ में छपती थी. इनकी मुख्य कृतियां भोर का तारा, कोणार्क, ओ मेरे सपने, शारदिया, दस तस्वीरें, परम्पराशील नाट्य, पहला राजा, जिन्होंने जीना जाना आदि है.

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