barauli asembali : जात-पात के शोर में दब रहा विकास का मुद्दा

barauli asembali : पहले नहीं होता था इतना शोरगुल, अब शोरगुल बनी चुनाव की पहचान
बरौली. जैसे-जैसे समय आगे गुजरता गया है, चुनावों में शोर बढ़ता जा रहा है. पहले के चुनाव मुद्दे पर लड़े जाते थे, अब तो हर तरफ अपनी जाति का शोर सुनने में आ रहा है. इस जातिगत शोर में विकास का मुद्दा पुरी तरह दब गया है, भूल कर भी कहीं से विकास की बात नहीं सुनी जा रही. चुनाव प्रचार की व्यवस्था अब पूरी तरह बदल गयी है, पहले साइकिल, बाइक या बैलगाड़ी से चुनाव प्रचार होता था, खूब होता तो एक भोंपू ले लिया जाता, लेकिन अब चमचमाती स्कॉर्पियो तथा कानफाड़ू डीजे चुनाव प्रचार की शान बन गये हैं. जो जितना अधिक शोर कर रहा है, वह उतना बड़ा प्रत्याशी माना जा रहा है. बरौली के पूर्व विधायक स्व बिजुल सिंह के बेटे मैनेजर सिंह जो खुद भी विधायक प्रत्याशी रह चुके हैं, वे पूर्व के चुनावों को याद करते हुए कहते हैं कि पहले नेता चुनाव के समय जो वादा करते थे, उसे पुरा करते थे. अनर्गल प्रलाप नहीं करते थे, लेकिन अब तो ये देखा जा रहा है कि चुनाव में मुद्दे ही नहीं हैं. सभी प्रत्याशी अपनी-अपनी जातियों के वोट पर अपना हक जता रहे हैं. जातिगत समीकरण देख कर ही अब पार्टियां भी प्रत्याशी खड़ा कर रही है. क्या किसी एक जाति के वोट से कोई प्रत्याशी चुनाव जीत सकता है भला, अक्सर ये सुनने में आ रहा है कि फलां प्रत्याशी फलां जाति के वोट में सेंध लगा रहा है, फलां जाति फलां उम्मीदवार को वोट दे रही है, तो फलां जाति इस बार फलां प्रत्याशी को वोट नहीं दे रही है. आखिर हम जा कहां रहे हैं, किस दुनिया में जा रहे हैं और ये कौन सा चुनाव प्रचार है, जिसमें विकास ही मुख्य मुद्दा नहीं है, केवल दूसरी जातियों को ललचा कर अपने पक्ष में वोट के लिए मनाया जा रहा है. जाति को केवल शादी-विवाह तक ही सीमित रखना उचित है, चुनावाें में जातियों को राजनीति के नाम पर लड़ाना कहीं से भी उचित नहीं है, इस पर सभी को ध्यान देना होगा.
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