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gopalganj election : लालू यादव के फुलवरिया में खामोशी, पर फिर सितारा चमकने की लोगों में उम्मीदें जिंदा

Updated at : 15 Nov 2025 9:00 PM (IST)
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gopalganj election : लालू यादव के फुलवरिया में खामोशी, पर फिर सितारा चमकने की लोगों में उम्मीदें जिंदा

gopalganj election : दो दशक बाद फुलवरिया के लोगों ने महसूस की सबसे बड़ी राजनीतिक चोट

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gopalganj election : राजद के लिए इस बार का विधानसभा चुनाव बड़ा झटका साबित हुआ है, जिसकी सबसे तेज और गहरी असरध्वनि उसके संरक्षक लालू प्रसाद के पैतृक गांव फुलवरिया में सुनायी दे रही है.

गोपालगंज, जिसे कभी लालू यादव की राजनीतिक प्रयोगशाला कहा जाता था, इस बार पूरी तरह एनडीए के रंग में रंग गया. जिले की सभी छह सीटों गोपालगंज, हथुआ, भोरे, बैकुंठपुर, बरौली और कुचायकोट पर एनडीए प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की. नतीजे आने के बाद फुलवरिया में जैसे सन्नाटा छा गया है. लोगों के चेहरों पर मायूसी और मनोबल के टूटने की झलक साफ दिखायी देती है. गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि दो दशक पहले तक फुलवरिया राजनीतिक चेतना का केंद्र था. लालू यादव जब सत्ता के शीर्ष पर थे, तो गांव में एक अनोखी रौनक रहती थी.

नेताओं की आमद, चौपालों में गहमागहमी और राजनीतिक चर्चा का लगातार दौर चलता था, लेकिन पिछले 20 वर्षों से लालू यादव सत्ता से बाहर हैं और इसी के साथ राजद का प्रभाव यहां धीरे-धीरे कमजोर होता गया. इस चुनावी हार ने मानो उस कमजोरी पर स्थायी मुहर लगा दी हो. गांव के नौजवान भी कहते हैं कि हवा में बदलाव के संकेत तो थे, लेकिन इतने बड़े अंतर से हार की उम्मीद किसी ने नहीं की थी. एक युवक ने अफसोस जताते हुए कहा कि हमारे गांव का नाम कभी बिहार की राजनीति में गर्व से लिया जाता था. आज हालत यह है कि पूरा जिला राजद से खाली हो गया. वहीं, एक बुजुर्ग महिला की आंखें भर आयीं. उन्होंने कहा कि लालू बाबू जब ताकत में थे, गांव में चहल-पहल रहती थी. आज लगता है जैसे अपना ही घर सूना हो गया हो.

अंदरखाने में चल रही पार्टी की चुनावी रणनीति की कमी की बातें

स्थानीय राजद कार्यकर्ता खुलकर कुछ नहीं कह पा रहे हैं, लेकिन अंदरखाने में कई लोग स्वीकारते हैं कि चुनावी रणनीति की कमी, नेतृत्व से दूरी और गांव-गांव तक संगठन की कमजोरी हार के प्रमुख कारण बने. दूसरी ओर, एनडीए का संगठित चुनाव अभियान, स्थानीय उम्मीदवारों की पकड़ और केंद्र-राज्य सरकार की योजनाओं का असर वोटों में साफ दिखायी दिया. फुलवरिया आज खामोशी में डूबा जरूर है, लेकिन उम्मीदें पूरी तरह मरी नहीं हैं. गांव के लोग गुदरी के लाल के राजनीतिक सितारे के फिर कभी चमकने की आस लगाये बैठे हैं. हालांकि इस चुनाव ने फुलवरिया और राजद के सामने कई कड़े सवाल खड़े कर दिये हैं, जिनका जवाब भविष्य की राजनीति ही दे पायेगी.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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SHAILESH KUMAR

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By SHAILESH KUMAR

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