आंगन में घट रही गौरैया के चहकने की आवाज
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :21 Mar 2017 2:15 AM (IST)
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तेजी से घट रही गौरैयों की संख्या चिंता का विषय आइए पक्षियों को बचाने के लिए लिया जाये संकल्प गोपालगंज : जब हम घर पर बैठे होते हैं, तो हमारे आंगन में, छतों-छज्जों पर चहकती हुई गौरैया का आना और दाना चुनना सबके मन को सुकून दे जाता है. यह वही गौरैया होती है, जिसके […]
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तेजी से घट रही गौरैयों की संख्या चिंता का विषय
आइए पक्षियों को बचाने के लिए लिया जाये संकल्प
गोपालगंज : जब हम घर पर बैठे होते हैं, तो हमारे आंगन में, छतों-छज्जों पर चहकती हुई गौरैया का आना और दाना चुनना सबके मन को सुकून दे जाता है. यह वही गौरैया होती है, जिसके चहकने की आवाज पर बच्चे अपनी आंखें मटकाने लगते हैं. उसी गौरैये को लेकर एक चिंता की बात है कि दिनों दिन इनकी संख्या घट रही है. इसके लिए शहरवासी जागरूक नहीं हो रहे हैं. 20 मार्च को गौरैया दिवस के मौके पर गौरैया सहित अन्य विलुप्त प्राय पक्षियों को बचाने के लिए दाना-पानी की व्यवस्था का संकल्प लें.
शहर में एक साल के अंदर 3500 से ज्यादा घोसले खत्म हो चुके हैं. एक घोसले से 10 बच्चे निकलते हैं. ऐसे में इनकी संख्या साल 2016 की अपेक्षा से दोगुनी घट चुकी है.
दिनों दिन गौरैयों की कमी से पर्यावरण को भी बेहद खतरा है. इसके पीछे दो बातें सामने आ रही हैं. एक तो बहुमंजिली इमारतों का बनना और दूसरा बगीचों का घटना. आज बगीचों में भी खोजने पर ही गौरैया का घोसला मिल पाता है. पहले घरों में गौरैया घोसला बनाती थी.
मार्च से मई तक बनाती हैं घोसला
गौरैया मार्च से लेकर मई तक घोसला बनाती हैं. अगर इनके संरक्षण पर जोर दिया जाये, तो एक साल में इनकी संख्या तीन गुना तक बढ़ सकती है. इसके लिए हम सभी को पहल करनी होगी. इसके घोसले के लिए जगह बनानी होगी. एक आकलन के मुताबिक शहर में कुल प्रजनन स्थल 285 से घट कर महज 110 रह गया है.
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मोबाइल बना घातक
मोबाइल से निकलने वाली रेज ने घरों से गौरैयों को दूर कर दिया है. पर्यावरण विद आरके शुक्ला की मानें, तो प्रत्येक घर में पांच से 10 मोबाइल रखे जा रहे हैं. उससे निकलने वाली रेज से गौरैया अब घरों में घोसला नहीं बना पा रही हैं.
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