60 फीसदी किसानों ने छोड़ दी गन्ने की खेती

60 फीसदी किसानों ने छोड़ दी गन्ने की खेती ससमय नहीं होता भुगतानकमीशन देकर बेचनी पड़ रही परची फोटो- 4, लहलहाती गन्ने की खेतसंवाददाता, पंचदेवरीपिछले कई दशकों से चल रही भुगतान नीति से तंग आकर 60 फीसदी किसानों ने अब गन्ने की खेती से मुंह मोड़ लिया है. पहले गांव में अधिकतर किसान थोड़ा-बहुत गन्ने […]
60 फीसदी किसानों ने छोड़ दी गन्ने की खेती ससमय नहीं होता भुगतानकमीशन देकर बेचनी पड़ रही परची फोटो- 4, लहलहाती गन्ने की खेतसंवाददाता, पंचदेवरीपिछले कई दशकों से चल रही भुगतान नीति से तंग आकर 60 फीसदी किसानों ने अब गन्ने की खेती से मुंह मोड़ लिया है. पहले गांव में अधिकतर किसान थोड़ा-बहुत गन्ने की खेती कर लेते थे, लेकिन अब स्थिति काफी बदल चुकी है. प्रत्येक गांव में गिने-चुने किसान ही गन्ने की खेती कर रहे हैं. वे भी अब इस खेती में पहले जैसा रुचि नहीं ले रहे हैं. गन्ने का भुगतान समय से नहीं होना तथा भुगतान में गन्ना माफिया का सक्रिय होना किसानों के लिए गंभीर समस्या बनी हुई है. वर्षों मिलों का चक्कर लगाने के बाद भी जब भुगतान नहीं होता है, तो किसानों को विवश होकर 20-25 प्रतिशत कमीशन देकर बिचौलियों के हाथों गन्ने की परची बेचनी पड़ती है, जिससे गन्ने का उचित मूल्य किसानों को नहीं मिल पा रहा है. वहीं, गन्ना माफियाओं द्वारा भी किसानों का जम कर शोषण किया जा रहा है. ऐसे में गन्ने की खेती से किसानों का मुंह मोड़ना लाजिमी है. यदि गोपालगंज में गन्ने की खेती के आंकड़ों पर नजर डालें, तो 2014-15 में कुल 64940.41 भूमि में गन्ने की खेती की गयी थी, जबकि इस साल शरदकालीन सत्र में मात्र 3817 एकड़ भूमि में गन्ने की खेती की गयी है. इसमें सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस रफ्तार में किसान गन्ने की खेती से अपने आप को अलग कर रहे हैं. प्रभावहीन हो गया केन यूनियनगन्ना किसानों की समस्याओं को लेकर आवाज उठानेवाली केन यूनियन अब पूरी तरह प्रभावहीन हो गयी है. 60 के दशक तक यह यूनियन गन्ने के मूल्य निर्धारण से लेकर भुगतान नीति व उत्पादन क्षेत्रों में अहम भूमिका निभाती रही. धीरे- धीरे मिल मालिकों व सरकार की विशेष नीति के तहत इसे प्रभावहीन कर दिया गया. आज सारी व्यवस्थाएं गन्ना मिल मालिकों के कार्यालयों से संचालित होती हैं. इससे सरकार द्वारा गन्ना किसानों को दी जा रही है सब्सिडी भी उन्हें समय से नहीं मिल पा रही है. गन्ना माफिया अब इस पूरी व्यवस्था पर हावी हो गया है. नतीजा यह है कि किसान को हर जगह शोषण कर शिकार होना पड़ रहा है. क्या कहते हैं अधिकारीफोटो- 5 मिलों द्वारा समय से भुगतान नहीं किये जाने के कारण किसान गन्ने की खेती छोड़ रहे हैं. गन्ना किसानों की समस्याओं को सरकार तक पहुंचाया गया है. सरकार भी इसके समाधान में लगी है.अखिलेश्वर कुमार प्रसाद, ईख परियोजना पदाधिकारी, गोपालगंजक्या कहते हैं चेयरमैनफोटो- 6सरकार व मिल मालिकों की संयुक्त नीति से केन यूनियन को प्रभावहीन कर दिया गया. उसके बाद गन्ना किसानों की आवाज सरकार तक पहुंचानेवाला कोई नहीं रहा.अवधेश प्रसाद यादव, पूर्व चेयर मैन केन यूनियन जलालपुरक्या कहते हैं किसानपहले व्यापक स्तर पर गन्ने की खेती करते थे. समय से भुगतान नहीं होने के कारण अब खेती करना बंद कर दिया गया है.फोटो- 7, संजय कुमार शुक्ल, जमुनहांकमीशन देकर बिचौलियों के हाथों गन्ने की परची बेचनी पड़ रही है, जिससे काफी नुकसान हो रहा है.फोटो- 8, सत्येंद्र राय, सेमरियाएक साल से गन्ने की परची लेकर मिल का चक्कर लगाते-लगाते थक गये. जब भुगतान नहीं हुआ, तो 25 प्रतिशत कमीशन देकर बिचौलियों के हाथों बेचना पड़ा. सुनील कुमार सिंह, नोडल कृषी समन्वयक, पंचदेवरीपिछले साल से मैने गन्ने की खेती करना बंद कर दी है. भुगतान के लिए काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.फोटो- 9, राम प्रवेश ठाकुार, गहनीकहने को औद्योगिक खेती और लाभ कुछ भी नहीं. परेशान होकर तीन सालों से गन्ने की खेती नहीं कर रहे हैं.फोटो- 10, सूर्यभान दूबेख, गहनी चकिया
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