मौत जरा ठहर, उठी है प्यार की लहर - बॉटम

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मौत जरा ठहर, उठी है प्यार की लहर – बॉटम विश्व एड्स दिवस आज : एचआइवी पीड़ितों की जिंदगी में नयी दिशा दे रही जावित्रीपरिवार की जिम्मेवारी के बाद पीड़ितों में भरती है हौसलासंवाददाता, गोपालगंज ये बात बिल्कुल दुरुस्त है कि मौत का कोई कैलेंडर नहीं होता, लेकिन जरा उनके बारे में सोचिए जो एचआइवी […]

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मौत जरा ठहर, उठी है प्यार की लहर – बॉटम विश्व एड्स दिवस आज : एचआइवी पीड़ितों की जिंदगी में नयी दिशा दे रही जावित्रीपरिवार की जिम्मेवारी के बाद पीड़ितों में भरती है हौसलासंवाददाता, गोपालगंज ये बात बिल्कुल दुरुस्त है कि मौत का कोई कैलेंडर नहीं होता, लेकिन जरा उनके बारे में सोचिए जो एचआइवी पॉजिटिव है. हर आहट चौंकाती है, मानो जिंदगी के दरवाजे पर मौत दस्तक दे रही हो. फिर भी जिंदगी की डोर प्यार की ओर खींचती है. हिम्मत न हो तो ये हसरतें दम तोड देंगी, लेकिन टेंशन लेने की जरूरत नहीं है. विश्व एड्स दिवस के मौके पर एक ऐसी महिला पर आधारित यह रिपोर्ट तैयार की गयी है, जो खुद 2003 में सड़क हादसे में घायल होने के बाद चढ़ाये गये खून से एचआइवी पॉजिटिव से ग्रसित हुई. मीरगंज की जावित्री देवी हैं. पति दिल्ली में खाद एवं प्रसंस्करण केंद्र प्रभारी हैं. खुद मनोविज्ञान में एमए हैं. एचआइवी से ग्रसित होने की जानकारी जब उनके परिजनों को मिली, तो वे हताश हो गये. उन्होंने हिम्मत और हौसले की बदौलत न सिर्फ अपनी जिंदगी को बेहतर बनाया, बल्कि एचआइवी पीड़ितों को मार्गदर्शन भी करती हैं. नतीजा भी जान लीजिए. अब तक एचआइवी संक्रमित तीन युवक-युवितयों की शादी करा चुकी हैं. मायूस जिंदगी में बहार लौट आयी है. जावित्री मानती हैं कि मौत तो दुर्घटना या किसी दूसरी जानलेवा बीमारी से भी हो सकती है. फिर, एड्स से डर कैसा? नियमित दवाइयां लेने से संक्रमित व्यक्ति पूरा जीवन जी सकता है.उठाया बीड़ाबकौल जावित्री किसी परिजन के एचआइवी संंक्रमित होने की जानकारी होते ही परिजन तक कटने लगते हैं. यह देख कर पीड़ित एकदम टूट जाते हैं. उनका जीवन एकाकी हो जाता है. उन्हें सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. ऐसे लोगों को जोड़ने का जावित्री ने बीड़ा उठाया. अभी तक वे दो एचआइवी पीड़ितों की शादी करा चुकी हैं. कई में तो खुद भी कन्यादान किया है. खुद को खत्म समझ चुके लोग जब हंसते-खिलखिलाते मिलते हैं, तो दिल को बेहिसाब खुशी मिलती है. पहल से बदली जिंदगीप्रशांत (22 वर्ष) (सामाजिक कारणों से नाम बदला हुआ) के माता-पिता की 17 साल पहले एड्स से मौत हो गयी थी. बूआ ने पालन-पोषण किया. कुछ साल बाद उसकी तबीयत भी खराब रहने लगी. जांच से पता लगा कि मां-बाप उसे एड्स का तोहफा दे गये हैं. जावित्री ने उसमें हौसला भरा. वे मंगेतर सीमा (20 वर्ष) से शादी करने जा रहे हैं. सीमा के पिता को संक्रमित खून चढ़ने से एड्स हो गया था. मां-बाप की मौत के बाद एक रिश्तेदार ने उसे पाला. रिश्ता तय होने से दोनों बेहद खुश हैं और भावी जीवन के सपने संजो रहे हैं. जावित्री बताती हैं कि एड्स पीड़ित मां-बाप के बच्चे सामान्य भी हो सकते हैं. नवजात को जन्म से 18 माह का होने तक नेप्रापिन ड्रॉप पिलाया जाता है. इससे संक्रमण का खतरा टल जाता है.

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