आतंकी फंडिंग में छात्रों के खाते का भी इस्तेमाल

Published at :28 Mar 2018 12:35 AM (IST)
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आतंकी फंडिंग में छात्रों के खाते का भी इस्तेमाल

लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा हैंडलर फोन कर फर्जी खाता खोलवाने का देता था निर्देश 500 से ज्यादा खातों में आया आतंक के लिए पैसा बैंक अधिकारियों से पूछताछ में जुटी एटीएस ‘लश्कर-ए-तैयबा के फंडिंग नेटवर्क से जुड़े अभी बाकी हैं सवाल गोपालगंज : टेरर फंडिंग (आतंक फैलाने के लिए धन मुहैया कराने) के लिए पाकिस्तान से […]

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लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा हैंडलर फोन कर फर्जी खाता खोलवाने का देता था निर्देश

500 से ज्यादा खातों में आया आतंक के लिए पैसा
बैंक अधिकारियों से पूछताछ में जुटी एटीएस
‘लश्कर-ए-तैयबा के फंडिंग नेटवर्क से जुड़े अभी बाकी हैं सवाल
गोपालगंज : टेरर फंडिंग (आतंक फैलाने के लिए धन मुहैया कराने) के लिए पाकिस्तान से चलाये जा रहे नेटवर्क में छात्रों के नाम पर फर्जी खातों का इस्तेमाल किया गया है. एटीएस के अधिकारियों के सामने जांच के दौरान कई राज खुल कर सामने आये है. लश्कर-ए-तैयबा के लिए गोपालगंज में रहकर शेख अब्दुल नईम सोहैल खान बनकर पूरे नेटवर्क को मजबूत किया. मॉड‍्यूल स्लीपर सेल तैयार किया, जिसके लिए पाकिस्तान से विभिन्न माध्यम से कैश उपलब्ध कराया गया.
सुरक्षा एजेंसियां अब गंभीरता से जांच में जुटी है. मांझा थाना क्षेत्र के आलापुर के रहने वाले मुकेश प्रसाद का नेटवर्क गोरखपुर के कारोबारी भाइयों नसीम अहमद और अरशद नईम के साथ जुड़ा हुआ है. नईम से पाकिस्तानी हैंडलर की सीधी बातचीत होती थी. पाकिस्तान में सक्रिय चरमपंथी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा हैंडलर उन्हें सीधे फोन कर फर्जी खाता खोलवाने और उसमें रुपये जमा करने का निर्देश देता था. उसके कहने पर वे लोग देश के विभिन्न हिस्सों में आतंक फैलाने के लिए रुपयों का इंतजाम करते थे और फर्जी नाम तथा पते से खोले गये खातों में रकम जमा करते थे. बाद में उसका इस्तेमाल आतंकियों द्वारा किया जाता है. एटीएस की छानबीन में पता चला है कि यूपी ही नहीं बिहार के कई जिलों में सीधे-साधे युवकों का इस्तेमाल भी टेरर फंडिंग जुटाने में किया गया है. देश की कई खुफिया एजेंसियां पूरे नेटवर्क पर काम कर रही है.
वीडियो चैट से करते थे संपर्क
आईजी ने बताया कि उमा प्रताप सिंह व उसके साथी पकिस्तानी हैंडलर से व्हाट्सएप कॉल व वीडियो चैट के माध्यम से संपर्क करते थे और खाता नंबरों तथा अन्य सूचनाओं का आदान-प्रदान व्हाट्सएप के माध्यम से करते थे, ताकि सुरक्षा एजेंसियों की नजर में न आ सकें. उमा प्रताप सिंह के पास प्राप्त मोबाइल फोन से प्राप्त डाटा से तमाम साक्ष्य मिले हैं, जिनका फॉरेंसिक विश्लेषण किया जा रहा है.
कैसे नजर में आये उमा प्रताप सिंह : एटीएस के आईजी असीम अरुण ने बताया कि फरवरी 2017 में एमपी एटीएस ने पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई द्वारा संचालित एक नेटवर्क को पकड़ा था, जो सिम बॉक्स द्वारा अंतरराष्ट्रीय कॉलिंग करा रहा था. इसके पाकिस्तानी हैंडलर चिह्नित हुए थे, जिन पर निगाह रखी गयी तो पाया गया कि वे नया नेटवर्क बनाने का प्रयास कर रहे हैं. इसी दौरान उमा प्रताप सिंह से पाकिस्तानी हैंडलर का संपर्क हुआ और उसके कहने पर उमा प्रताप ने नया नेटवर्क बना लिया.
यूपी एटीएस इस पर नजर रख रही थी कि पाकिस्तानी हैंडलर्स किससे संपर्क कर रहे हैं? इसी कोशिश में उमा प्रताप निगाह में आ गया. इसके फोन व बैंक खाते की जांच से स्पष्ट हुआ की यह मनी सप्लाई नेटवर्क बना चुका है और पाकिस्तानी हैंडलर के इशारे पर काम कर रहा है.
उन्होंने बताया कि अभी तक हुई पूछताछ में उमा प्रताप ने स्वीकार किया है कि वह लालच वश इन गतिविधियों में लिप्त हो गया.
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