Gaya News : समय के साथ बदल गयी होली, न रहा सामाजिक सौहार्द न ही रिश्तों में अपनापन

Gaya News : होली का त्योहार बस कुछ ही दिनों में देने वाला है दस्तक
गुरुआ. होली का त्योहार बस कुछ ही दिनों में दस्तक देने वाला है. यह रंगों का पर्व खुशी, मेल-जोल और भाईचारे का प्रतीक रहा है, लेकिन समय के साथ इसमें कई बदलाव आये हैं. पुराने समय की होली और आज की होली में काफी अंतर देखने को मिलता है. जहां पहले होली पूरे मोहल्ले और गांव के लोगों के साथ मिलकर खेली जाती थी, वहीं अब यह एक सीमित दायरे में सिमट गयी है. होलिका दहन के दिन होलिका जलाने के बाद सभी मिलकर होली गाते-बजाते और पारंपरिक पकवानों का आनंद लेते थे. खास बात यह थी कि इसमें अमीरी-गरीबी का कोई भेदभाव नहीं होता था. हर कोई एक साथ शामिल होता और सच्चे मन से इस त्योहार का आनंद उठाता था. पहले होली प्रेम और सौहार्द का प्रतीक था. होली अब सीमित दायरे में सिमट गयी है. पहले होली प्रेम और भाईचारे का प्रतीक थी. समय के साथ अब कई बदलाव आ गये हैं.
क्या है लोगों की राय
पहले के लोग होली के दिन एक दूसरे से गले मिलते थे. हर कोई एक दूसरे के घर जाता था और हसी-खुशी के साथ एक-दूसरे को होली की बधाई देते थे. लेकिन आज के दिनों में अश्लील गाना गाते हैं और मर्यादा का ख्याल नहीं रखते.रामचंद्र प्रसाद सिंह पूर्व विधायक, गुरुआ (फोटो- गया गुरुआ- 2000)होली रंगों का मुख्य त्योहार है. पहले की अपेक्षा आज बहुत परिवर्तन हो गया है. हमलेग बचपन में निर्भिक होकर होली खेलते थे. अब धीरे-धीरे लोगों के बीच आपसी सौहार्द खत्म होते जा रहा है. अब यह होली सीमित दायरा में सिमट कर रह गया है.
प्रियरंजन उर्फ कुंदन, छात्र (फोटो- गया गुरुआ- 2001)पहले की होली और आज की होली में काफी अंतर आया है. हमलोग होली आने के महीनों दिन पहले से तैयारियां करने में जुट जाते थे. बच्चे होली के लिए पहले से ही कपड़ा खरीदने की तैयारी करते थे.दांगी शोभा कुमारी, प्राचार्य जीएस पब्लिक स्कूल (फोटो- गया गुरुआ- 2002)पहले पारिवारिक और सामाजिक उत्सव था. पहले के दौर में होली सिर्फ रंगों का खेल नहीं, बल्कि एक पारिवारिक और सामाजिक उत्सव हुआ करता था. अब फुहड़ गानों, नकली रंग व अबीरों के कारण होली का रंग फीका हो गया है.
रुपा रंजन, सामाजिक कार्यकर्तापहले होली जैसे पर्व में लोग प्रदेश से घर आते थे और गांव घर में रहकर होलिका दहन करने के लिए एक साथ अगजा के समीप जमा होते थे, आज यह सब धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहा है. अगजा के समीप रस्म लोग पूरा करते हैं.अंकित सिन्हा, युवाआज के परिवेश में संपन्नता के बावजूद सारी सामाजिक मान्यताओं को तोड़कर मनमाने ढंग से होली का त्योहार मनाते हैं. पहले गांव में अधिकतर घरों के दरवाजे पर लोग बैठकर होली गाते थे.जो अब देखने को नहीं मिलता.
सत्येंद्र कुमार, निदेशक, तारा इंस्टीट्यूटडिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है
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