पहला अनुभव ही अच्छा रहा, फिर चाहेंगे आना

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हस्तशिल्प मेला व प्रदर्शनी में भाग लेने आये लोगों ने बांटे अनुभव गया : पटना के एसकेपुरी की उषा झा की मधुबनी पेंटिंग के स्टॉल पर बैठे राम प्रकाश कुमार ने बताया कि मेले के दाैरान 70 हजार से अधिक का काराेबार हुआ. हर राेज करीब 10-12 हजार रुपये का काराेबार हुआ. यहां पहली बार […]

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हस्तशिल्प मेला व प्रदर्शनी में भाग लेने आये लोगों ने बांटे अनुभव
गया : पटना के एसकेपुरी की उषा झा की मधुबनी पेंटिंग के स्टॉल पर बैठे राम प्रकाश कुमार ने बताया कि मेले के दाैरान 70 हजार से अधिक का काराेबार हुआ. हर राेज करीब 10-12 हजार रुपये का काराेबार हुआ.
यहां पहली बार स्टॉल लगाया हूं. पटना व राजगीर आदि जगहाें से अच्छा काराेबार हुआ. अगली बार फिर आना चाहूंगा.सीतामढ़ी की सिक्की शिल्प की कृष्णा देवी व सुदामा देवी ने बताया कि वह बचपन से यह काम कर रही हैं. उनके बच्चे भी अब इस कला में माहिर हाे गये हैं. पहली बार बाेधगया में बाैद्ध महाेत्सव के दाैरान 2012 में आये थे, पर बिक्री अच्छी नहीं हुई थी. इस बार भराेसा से ज्यादा बिक्री हुई. अगले साल फिर आऊंगी. हर दिन करीब पांच से सात हजार रुपये की बिक्री हुई. दाेबारा सामान मंगाना पड़ा.
पटना से आये वेणु (बांस) शिल्प के कवि कुमार काैशल ने भी स्टॉल लगाया है. यहां यह उनका दूसरा साल है. दूसरे जगह से यहां बेहतर काराेबार हुआ. हर दिन करीब 25-30 हजार रुपये का काराेबार हाे जाता था. 30 रुपये में बिकने वाला कछुआ काफी बिका आैर लाेगाें ने उसे खूब पसंद किया. अगले साल फिर आऊंगा.
उत्तरी मंदिरी, पटना की एप्लिक/कशीदा की स्टॉल लगायी राज्य पुरस्कार प्राप्त कमला देवी ने बताया कि 10-12 हजार रुपये राेजाना की बिक्री हुई. उन्हाेंने बताया कि गया का मेला अन्य जगहाें से बेहतर रहा. 100 महिलाआें का समूह एप्लिक व कशीदा का काम करती हैं. वह डिजाइन तैयार कर देती हैं आैर कशीदा गढ़ने का काम समूह की महिलाएं करती हैं.
उधर, पत्थर, पेपरमेसी, टेराकाेटा व काष्ठ कला का डेमाेंस्ट्रेशन दिखा रहे कलाकार में पत्थर कला के कैमूर के फिरंगी लाल गुप्ता की कला देख लाेग अचंभित थे. हाथी के अंदर हाथी. फिरंगी लाल गुप्ता ने बताया कि उनकी कला का नमूना भभुआ संग्रहालय में रखा है. 10 क्विंटल के पत्थर काे तराश कर चार क्विंटल वजन तक के हाथी के अंदर हाथी बना चुके हैं. वह 1992 से इस कला में काम कर रहे हैं. पटना, दिल्ली, आगरा व गाेवा आदि जगहाें पर स्टॉल लगा चुके हैं. गया में पहली बार आये हैं.
पेपरमेसी कला में निपुण मधुबनी की हेमा देवी ने बताया कि वह 20 वर्षाें से यह काम कर रही हैं. उन्होंने बताया कि नेशनल अवार्ड प्राप्त सास शुभद्रा देवी से यह कला सीखी है. वह यहां डाेली का डिमांस्ट्रेशन कर रही थीं. डाेली जाे आज की तारीख में लगभग समाप्त हाे गयी है.
मानपुर मल्लाहटाेली के काष्ठ कला के कलाकार धीरज कुमार वर्मा भी राज्य पुरस्कार प्राप्त कलाकार हैं.वह काठ से महाबाेधि मंदिर व भगवान बुद्ध की अनेक मुद्राआें में मूर्ति के अलावा अन्य मूर्तियाें का निर्माण करते हैं. वह दूसरे राज्याें में भी अपना प्रदर्शन कर चुके हैं. इसी जगह पर टेराकाेटा (मिट्टी) से मूर्तियां बनानेवाले दरभंगा के जगदीश पंडित भी डेमाेंस्ट्रेशन कर रहे थे. उनकी कला में गणेश की मूर्ति व मां की गाेद में बच्चे को दिखाया गया है.
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