भारतीय संस्कृति के पुरोधा थे मैक्समूलर

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भारतीय संस्कृति के पुराेधा थे मैक्समूलरफाेटाे- डॉ राम सिंहासन सिंह. विश्वविख्यात विद्वान फ्रेडरिक मैक्समूलर का जन्म छह दिसंबर, 1823 काे जर्मनी में हुआ था. मैक्समूलर पाश्चात्य विद्वानाें में अग्रणी माने जाते हैं, जिन्हाेंने वैदिक तत्वज्ञान काे मानव सभ्यता का मूलस्त्राेत माना. स्वामी विवेकानंद ने उन्हें ‘वेदांतियाें का भी वेदांती’ कहा था. उनका भारत के प्रति […]

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भारतीय संस्कृति के पुराेधा थे मैक्समूलरफाेटाे- डॉ राम सिंहासन सिंह. विश्वविख्यात विद्वान फ्रेडरिक मैक्समूलर का जन्म छह दिसंबर, 1823 काे जर्मनी में हुआ था. मैक्समूलर पाश्चात्य विद्वानाें में अग्रणी माने जाते हैं, जिन्हाेंने वैदिक तत्वज्ञान काे मानव सभ्यता का मूलस्त्राेत माना. स्वामी विवेकानंद ने उन्हें ‘वेदांतियाें का भी वेदांती’ कहा था. उनका भारत के प्रति अनुराग जगजाहिर है. उन्हाेंने भारतवासियाें के पूर्वजाें की चिंतन राशि काे यथार्थ रूप में लाेगाें के सामने प्रकट किया. उनके प्रकांड पांडित्य से प्रभावित हाेकर सम्राज्ञी विक्टाेरिया ने 1868 में उन्हें अपने अॉस्बाेर्न प्रासाद (महल) में ऋग्वेद व संस्कृत के साथ यूराेपियन भाषाआें की तुलना आदि विषयाें पर व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया था. उस भाषण काे सुनकर विक्टाेरिया इतनी प्रभावित हुई कि उन्हें ‘नाइट’ की उपाधि प्रदान कर दी.मैक्समूलर का ‘भारत से हम क्या सीखें’ अत्यंत प्रमुख आलेख हैं. प्रस्तुत आलेख वस्तुत: भारतीय सिविल सेवा हेतु चयनित युवा अंगरेज अधिकारियाें के आगमन के अवसर पर संबाेधित भाषणाें की श्रृंखला की एक कड़ी है. प्रथम भाषण का यह अविकल रूप से संक्षिप्त व संपादित अंश है, जिसका भाषांतरण डॉ भवानी शंकर त्रिवेदी ने किया है. भाषण में मैक्समूलर ने भारत की प्राचीनता व विलक्षणता का प्रतिपादन करते हुए नवागंतुक अधिकारियाें काे यह बताया कि विश्व की सभ्यता भारत से बहुत कुछ सीखती व ग्रहण करती आयी है. उनके लिए भी एक साैभाग्यपूर्ण अवसर है कि वे इस विलक्षण देश आैर उसकी सभ्यता-संस्कृति से बहुत कुछ सीख-जान सकते हैं. यह भाषण आज भी उतना ही प्रासंगिक है. साथ ही, स्वदेशाभिमान के विलाेपन के इस दाैर में इस भाषण की विशेष सार्थकता है. भारत की नयी पीढ़ी मैक्समूलर के भाषण से अपने देश व इसकी प्राचीन सभ्यता-संस्कृति, ज्ञान-साधना व प्राकृतिक वैभव आदि की महत्ता का प्रामाणिक ज्ञान प्राप्त कर सकेगी.मैक्समूलर बचपन में ही संगीत के अतिरिक्त ग्रीक व लैटिन भाषा में निपुण हाे गये थे. 18 वर्ष की उम्र में उन्हाेंने लिपजिंग विश्वविद्यालय में संस्कृत का अध्ययन शुरू कर दिया था. उन्हाेंने ‘हिताेपदेश’ का जर्मन भाषा में अनुवाद प्रकाशित करवाया. इसी समय उन्हाेंने ‘कंठ’ व ‘केन’ आदि उपनिषदाें का जर्मन भाषा में अनुवाद किया और कालीदास के ‘मेघदूत’ का जर्मन पद्यानुवाद भी किया. भारतभक्त, संस्कृतानुरागी व वेदाें के प्रति आगाध आस्था वाले मैक्समूलर का 28 अक्तूबर, 1900 में निधन हाे गया. – लेखक रामलखन सिंह यादव कॉलेज के प्राचार्य हैं

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