नोटबंदी के बाद ठंडी त पेट पर डरामें गिरा देलकै

Published at :15 Dec 2016 6:10 AM (IST)
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नोटबंदी के बाद ठंडी त पेट पर डरामें गिरा देलकै

ठंड में मजदूरी . दोनों समस्याओं से जूझ रहे दैनिक मजदूर काम कराने के बाद मालिक थमाना चाहता चेक या पुराना नोट उधार का काम करते-करते थक चुके मजदूर मालिकों के यहां कई दिनों की मजदूरी बकाया खुदरा पैसा देखने के बाद महाजन देता सामान दरभंगा : पहले बड़े नोटों के बैन किये जाने और […]

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ठंड में मजदूरी . दोनों समस्याओं से जूझ रहे दैनिक मजदूर

काम कराने के बाद मालिक थमाना चाहता चेक या पुराना नोट
उधार का काम करते-करते थक चुके मजदूर
मालिकों के यहां कई दिनों की मजदूरी बकाया
खुदरा पैसा देखने के बाद महाजन देता सामान
दरभंगा : पहले बड़े नोटों के बैन किये जाने और अब हाड़ कंपाती ठंड ने रोज कमाने खाने वालों को कहीं का नहीं छोड़ा है. नोट बंदी के करीब महीना भर बाद जब काम मिलना धीरे-धीरे शुरू हुआ तो ठंढ़ ने काम छीन लिया. मजदूर प्रत्येक दिन इस आस में नगर के चौक-चौराहे पर जुटते हैं कि काम मिलेगा पर निराश होकर अधिकांश को वापस घर लौट जाना पड़ता है. मजदूरी की तलाश में विभिन्न चौक चौराहे पर जुटे लोगों से जब काम मिलने को लेकर बात की गयी तो उनका दर्द ओठों पर छलक उठा.
मजदूरों का कहना है कि एक तो नोट बंदी ने पहले से ही हाल बिगाड़ रखा था उपर से ठंड तो कोढ़ में खाज बनकर आ गयी है. दिहाड़ी पर काम करने वाले मजदूरों के पेट पर डराम गिराने जैसी स्थिति है.
नोटबंदी का फायदा उठा रहे काम करानेवाले लोग: काम कराने वाले लोग नोटबंदी का खूब फायदा उठा रहे हैं. काम कराने के बाद जब मजदूरी देने का समय आता है तब चेक या फिर पुराने नोट थमाने की कोशिश करते हैं. इनकार करने पर बैंको में खुदरा पैसा नहीं मिलने का बहाया जाता है. मजदूरी नहीं मिलने के कारण काम करते रहना पड़ता है. बावजूद जब पैसा नहीं मिलता तो दूसरे घरों में मजदूरी तलाशनी पड़ती है. कहीं पैसा मिलता है तो कहीं उधार रह जाता है. ठंड के कारण रोज काम भी नहीं मिलता.
अब तो हाथ में खुदरा पैसा देखने के बाद ही महाजन सामान देने को तैयार होता है. नोट बंदी अमीरों के लिए तो ठीक है, लेकिन मजदूरों के लिए किसी अकाल से कम नहीं है. मजदूरों ने कहा कि नोट बंदी तो सही है लेकिन काम नहीं मिलना तथा मिलने पर पैसा नहीं मिलने से परेशानी तो हो रही है.
बाबू नोटबंदी और ठंडी पेट पर डराम गिरा देलकै. रोज कमाने खाने वाले हैं. नोट बंदी व ठंढ़ न हम जैसे गरीबों के लिए समस्या बढ़ाने का काम किया है. काम करने के बाद भी मजदूरी नही मिलती है. ऐसे में खाने-पीने की व्यवस्था करने में मुश्किल हो रही है. नोट बंदी मालिकों को फायदा किया तो मजदूर वर्ग को नुकसान. कभी काम मिलता है तो कभी नहीं. ऐसी हालत में हमलोगों के लिए नोट बंदी किसी आफत से कम नहीं है.
शिवू पासवान,राजमिस्त्री, लक्ष्मीसागर चुनाभट्टी
नोटबंदी व ठंड से रोजगार का अभाव हो गया है. लंबी दूरी तय कर काम की तलाश में शहर आता हूं. एक तो जल्दी काम नहीं मिलता और मिलता भी है तो मजदूरी नही दी जाती. एक महीनें से नोट बंदी के कारण बुरे दौर से गुजरना पड़ रहा है। नोट बंदी नही यह भोजन बंदी है. उपर से ठंड तो और परेशान कर रहा है. काम नहीं मिलता मिलता है तो खाली हाथ घर लौटना पड़ता है.
प्रदीप यादव, राज मजदूर, काकरघाटी
नोटबंदी ठीक है पर मजदूरों के लिए सही नहीं हुआ है. रोजी-रोटी नहीं मिल रही है. ठंढ़ के कारण और परेशानी हो रही है. काम कराने के बाद मालिक के द्वारा चेक दिये जाने की बात की जाती है. भला चेक पर महाजन सामान कैसे देगा. बाल-बच्चे भूखे मरने की कगार पर है. खुदरा पैसा नहीं होने का बहाना बनाकर काम कराने वालों द्वारा टरकाने का प्रयास किया जाता है। एक तो नोट बंदी दूसरी बढ़ रही ठंडी हम जैसे मजदूरों पर भाड़ी पड़ रहा है.
रामसोगारथ यादव,
राजमिस्त्री, मुसहरी, गौसाघाट
सरकार के नोट बंदी का फैसला हम जैसे दैनिक मजदूरों के हक में ठीक नहीं हुआ. नोट बंदी ने हमलोगों का काम-धंधा बंद कर दिया है. काम करने के बाद भी खाली हाथ घर वापस जाना पड़ता है. उपर से ठंढ़ तो और बर्वाद कर रहा. ऐसे में बाल-बच्चों को क्या खिलाएंगे. महाजन खुदरा पैसा बिना देखे सामान देने को तैयार नही होता है. पेट मानता नहीं है. लंबी दूरी तय कर रोजगार के लिए आता हूं. काम मिला तो भी नही मिला तो भी खाली हाथ घर लौटने की मजबूरी होती है.
राजकुमार यादव,
राजमजदूर केवटी रनवे
हम जैसे लोग रोज कुंआ खोद कर पानी पीने वाले हैं. नोटबंदी के साथ कड़ाके की ठंढ़ मजदूरों के लिए अकाल समय ला दिया है. नोट बंदी के कारण काम करने के बाद भी मजदूरी नही मिलती. गांव में महाजन उधार सामान नहीं देता है. पेट पर आफत आ गया है. नोट बंदी का हवाला देकर मालिक फायदा उठाते हैं. काम करूं तो भी जाता हूं, नहीं करूं तो भी. दोनों स्थिति में नुकसान झेलना पड़ रहा है.
अमरनाथ यादव, राज मजदूर, काकरघाटी
नोटबंदी अच्छा है लेकिन अमीरों के लिए. इसका बुरा प्रभाव हम जैसे मजदूर पर पड़ रहा है. काम कराने के बाद बंद कर दिए गये नोट मजदूरी में मालिक की ओर से लेने का दबाव दिया जाता है. मना करने पर मजदूरी नहीं मिलती है. ठंड के कारण तो काम भी नहीं मिल रहा. बिना पैसा सामान नहीं मिलता. ऐसे में पेट चलाने के लिए क्या करें. लगातार एक माह से समस्या झेल रहा हूं. रोज-कमाने खाने वाले के लिए यह आफत से कम नहीं है.
मो.अमन्ना उर्फ मन्ना, राज मजदूर गौसाघाट
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