बिना शीशावाली गाड़ियों में यात्रा करने की मजबूरी

Published at :12 Dec 2016 5:18 AM (IST)
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बिना शीशावाली गाड़ियों में यात्रा करने की मजबूरी

कड़ाके की ठंड. गाड़ी तेज चलने पर कांपने लगते हैं बसयात्री यात्रियों ने कहा, वाहन मालिकों के साथ परिवहन विभाग भी दोषी दरभंगा : हाड़ कंपकपाने वाली ठंड से जहां आम लोगों का हाल बुरा है, वहीं बसों में यात्रा करने वाले लोग तो बेहाल ही हैं. मैक्सी व बसों के टूटे शीशा के कारण […]

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कड़ाके की ठंड. गाड़ी तेज चलने पर कांपने लगते हैं बसयात्री

यात्रियों ने कहा, वाहन मालिकों के साथ परिवहन विभाग भी दोषी
दरभंगा : हाड़ कंपकपाने वाली ठंड से जहां आम लोगों का हाल बुरा है, वहीं बसों में यात्रा करने वाले लोग तो बेहाल ही हैं. मैक्सी व बसों के टूटे शीशा के कारण यात्रियों को सफर करने में बुरे हालात से गुजरना पड़ रहा है. ऐसे शीशा विहीन खिड़की वाली दर्जनों गाड़ियां सड़कों पर दौड़ लगा रही है. टूटी खिड़की के कारण यात्रियों की ठंड लगने की शिकायत को वाहन कर्मी नजर अंदाज कर रहे हैं. वाहनकर्मियों को यात्रियों को ठंड से बचाने पर कम अपनी जेब गर्म करने की ज्यादा चिन्ता रहती है.
शीशा विहीन गाड़ियों में सफर कर रहे वुजूर्गो, बीमार व बच्चों की जान ठंड के कारण सांसत में पड़ी रहती है. यात्रियों का मानना है कि इसके लिए वाहन मालिकों के साथ-साथ परिवहन विभाग दोषी है. दरभंगा व लहेरियासराय से विभिन्न जिले, अनुमंडल व प्रखंडों के लिए सौ से अधिक गाड़ियां चलती है. अधिकांश गाड़ियों के शीशे क्षतिग्रस्त है. गाड़ी मालिक शीशा लगाना जरूरी नहीं समझते. यात्रा करने वाले मजबूरी में इन गाड़ियों से सफर तो करते हैं लेकिन इसका मोल चुकाना पड़ता है. मुकाम तक पहुंचते-पहुंचते ठंड से लोगों की हालत खराब हो जाती है.
बसों में सुविधा का अभाव
दरभंगा बस स्टैंड में बिना शीशा की बस में बैठे यात्री. लहेरियासराय बस स्टैंड में बिना शीशावाली बस.
मुजफ्फरपुर जीरो माइल तक सफर करना है. ठंड बढ़ने के कारण पांव पैदल चलना मुश्किल है. मैक्सी की खिड़की का शीशा टूटा है. भाड़ा पूरा लेता है, लेकिन सुविधा पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता. कहने पर उलटे कर्मी बात का बतंगर करते हैं. सफर करना मजबूरी है.
गोपाल कुमार
हाजीपुर चौक जाना है. गाड़ी का शीशा टूटा हुआ है. कहने से इन लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता है. ऐसी हालत में सफर के दौरान किसी को कुछ होने पर जिम्मेदार कौन होगा. गाड़ी चलने पर तेज हवा का ठंडा झोका आता रहता है. परिवहन विभाग को इस ओर ध्यान देना चाहिए था.
अजित नारायण मंडल
टेकटार कमतौल जाना है. िबना शीशा वाली गाड़ी में सफर करना इस ठंड में भाड़ी पड़ रहा है. शिकायत करने पर खुद की गाड़ी खरीद कर सफर करने की सलाह दी जाती है. गाड़ी जब तक चलती रहती है ठंड से लोग बेहाल रहते हैं. यात्री की जान जाये या फिर रहे इससे इनको कोई मतलब नही है.
वीणा देवी
पाराडीह तक खुली खिड़की के साथ सफर करना मजबूरी है. पैसा तो पूरा लेता है, लेकिन यात्रियों को ठंड से बचाने के लिए शीशा लगवाना गाड़ी मालिक जरूरी नहीं समझता. शिकायत का भी इन पर कोई असर नहीं होता है. इनलोगों की यात्रियों के प्रति संवेदना ही मर चुकी है.
पंकज कुमार
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